शतरुद्र संहिता · अध्याय 15
किरात और अर्जुन
अब तक की कहानी
शिव ने अपने भक्त मार्कंडेय को यमराज से बचाया। शतरुद्र संहिता शिव के अनेक अवतारों की कथा कहती है। उनमें से एक है किरात अवतार।
पांडव वनवास में थे। वेदव्यास जी ने अर्जुन से कहा — आने वाले युद्ध के लिए तुम्हें दिव्य अस्त्र चाहिए, इसके लिए शिव की तपस्या करो। अर्जुन इंद्रकील पर्वत पर गए और एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप करने लगे। उनके तप से वन के ऋषि भी चकित थे।
एक दिन मूक नाम का एक असुर विशाल सूअर का रूप लेकर अर्जुन को मारने आया। अर्जुन ने धनुष उठाया और बाण चलाया। उसी क्षण एक और बाण आकर सूअर को लगा। सूअर गिर पड़ा। अर्जुन ने देखा — सामने एक यानी वनवासी शिकारी खड़ा था, साथ में उसकी पत्नी और शिकारी साथी।
यह किरात स्वयं शिव थे, और किरातिनी के वेश में पार्वती। दोनों में बहस हो गई — शिकार मेरा है! बात युद्ध तक पहुँच गई। अर्जुन ने अपने सारे बाण चलाए, पर किरात को कुछ न हुआ। धनुष टूट गया, तलवार भी बेकार हो गई। फिर दोनों में मल्लयुद्ध हुआ, और अर्जुन थककर गिर पड़े।
तब अर्जुन ने मन ही मन शिव को याद किया। अचानक उन्हें समझ आया कि यह साधारण शिकारी नहीं हो सकता। जैसे ही उन्होंने ध्यान से देखा, किरात के स्थान पर त्रिशूल और जटा वाले शिव खड़े थे। अर्जुन उनके चरणों में गिर पड़े और अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी।
शिव मुस्कुराए — मैं तुम्हारे साहस और भक्ति की परीक्षा ले रहा था। उन्होंने अर्जुन को अपना महान अस्त्र दिया और उसे सँभालने की विधि भी सिखाई। साथ में यह भी समझाया कि ऐसे अस्त्र का उपयोग केवल धर्म की रक्षा के लिए करना।
आज के जीवन में सीख
जीवन की परीक्षाएँ कभी-कभी अनजाने रूप में आती हैं। हार में भी विनम्र रहना और अपनी गलती मान लेना ही असली जीत है।
सभी अध्याय
- 1शिव पुराण क्या है?
- 2अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
- 3शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
- 4सती और दक्ष का यज्ञ
- 5वीरभद्र और दक्ष के यज्ञ का विनाश
- 6तारकासुर का वरदान और कामदेव का भस्म होना
- 7पार्वती की तपस्या
- 8शिव-पार्वती विवाह
- 9कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध
- 10गणेश का जन्म और हाथी का सिर
- 11त्रिपुरासुर और एक बाण
- 12नीलकंठ — जब शिव ने विष पिया
- 13गंगा का अवतरण — शिव की जटा में
- 14मार्कंडेय और काल पर विजय
- 15किरात और अर्जुन
- 16शिव के रूप — अर्धनारीश्वर और नटराज
- 17शिकारी और पहली शिवरात्रि
- 18बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 1
- 19बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2