रुद्र संहिता · अध्याय 7
पार्वती की तपस्या
अब तक की कहानी
तारकासुर से बचने के लिए देवताओं ने कामदेव को भेजा, पर शिव के तीसरे नेत्र से कामदेव भस्म हो गए। शिव वहाँ से चले गए।
कामदेव के भस्म होने के बाद शिव वहाँ से अंतर्धान हो गए। पार्वती समझ गईं कि रूप और सौंदर्य से शिव को नहीं पाया जा सकता। उन्होंने निश्चय किया — मैं तप करूँगी, और अपने मन की सच्चाई से शिव को पाऊँगी।
माँ मैना ने बहुत रोका — बेटी, तुम इतनी कोमल हो, जंगल का कठोर तप कैसे सहोगी? पर पार्वती का मन अडिग था। वे राजसी वस्त्र छोड़कर वल्कल पहनकर वन में चली गईं। गर्मी में अग्नि के बीच बैठीं, सर्दी में ठंडे जल में खड़ी रहीं।
पहले वे फल-फूल खाती थीं, फिर केवल सूखे पत्ते, और अंत में पत्ते भी छोड़ दिए। इसीलिए उनका एक नाम पड़ा। उनके तप का तेज इतना बढ़ा कि तीनों लोक उससे प्रभावित होने लगे।
शिव ने पहले सप्तर्षियों को उनकी परीक्षा लेने भेजा। फिर स्वयं एक जटाधारी का वेश बनाकर आए और बोले — तुम राजकुमारी होकर उस शिव के लिए तप कर रही हो जो श्मशान में रहते हैं, साँप लपेटते हैं, जिनका न घर है न कुल? पार्वती का चेहरा लाल हो गया।
उन्होंने कहा — आप शिव को नहीं जानते। जो सबका आधार है, उसे घर की क्या ज़रूरत? अब मैं शिव की निंदा एक पल भी नहीं सुनूँगी। यह कहकर वे जाने लगीं। तभी ब्रह्मचारी के स्थान पर स्वयं शिव खड़े थे। मुस्कुराकर बोले — देवी, आज से मैं तुम्हारा हूँ। तुम्हारे तप ने मुझे जीत लिया।
आज के जीवन में सीख
जो चीज़ सच में कीमती है, वह आसानी से नहीं मिलती। लगन, धैर्य और भरोसा बड़े से बड़ा लक्ष्य भी पास ले आते हैं।
सभी अध्याय
- 1शिव पुराण क्या है?
- 2अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
- 3शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
- 4सती और दक्ष का यज्ञ
- 5वीरभद्र और दक्ष के यज्ञ का विनाश
- 6तारकासुर का वरदान और कामदेव का भस्म होना
- 7पार्वती की तपस्या
- 8शिव-पार्वती विवाह
- 9कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध
- 10गणेश का जन्म और हाथी का सिर
- 11त्रिपुरासुर और एक बाण
- 12नीलकंठ — जब शिव ने विष पिया
- 13गंगा का अवतरण — शिव की जटा में
- 14मार्कंडेय और काल पर विजय
- 15किरात और अर्जुन
- 16शिव के रूप — अर्धनारीश्वर और नटराज
- 17शिकारी और पहली शिवरात्रि
- 18बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 1
- 19बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2