कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 19
बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2
अब तक की कहानी
हमने सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकाल, ओंकारेश्वर, केदारनाथ और भीमाशंकर की कथाएँ पढ़ीं। अब बाकी छह ज्योतिर्लिंग।
काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) — काशी को शिव की अपनी नगरी कहा जाता है। परंपरा कहती है कि यह नगरी शिव के त्रिशूल पर टिकी है और प्रलय में भी नष्ट नहीं होती। यहाँ शिव विश्वनाथ यानी पूरे विश्व के स्वामी के रूप में विराजते हैं, और भक्तों का विश्वास है कि काशी में शिव स्वयं मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं।
त्र्यंबकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र) — गौतम ऋषि से ईर्ष्या करने वाले कुछ ऋषियों ने छल से उन पर गौ-हत्या का दोष लगा दिया। दुखी गौतम ने शिव की तपस्या की। शिव ने प्रसन्न होकर वहाँ गंगा को गोदावरी के रूप में प्रकट किया और स्वयं त्र्यंबक यानी तीन नेत्रों वाले शिव के रूप में बस गए।
वैद्यनाथ — रावण ने कठोर तप करके शिव को प्रसन्न किया और उनका लिंग लंका ले जाने का वर माँगा। शर्त थी कि रास्ते में इसे धरती पर न रखे। रास्ते में रावण ने लिंग थोड़ी देर के लिए एक ग्वाले को थमाया, और उसने उसे नीचे रख दिया। लिंग वहीं स्थिर हो गया। प्रचलित मान्यता में यह झारखंड का देवघर है, जबकि स्तोत्र की परंपरा परली (महाराष्ट्र) का नाम लेती है।
नागेश्वर (द्वारका के पास, गुजरात) — दारुक नाम का असुर और उसकी पत्नी दारुका वन में लोगों को सताते थे। उन्होंने सुप्रिय नाम के एक शिवभक्त व्यापारी को कैद कर लिया। कैद में भी सुप्रिय शिव का नाम जपता रहा। शिव प्रकट हुए, असुरों का नाश किया और वहीं नागेश्वर नाम से बस गए।
रामेश्वरम (तमिलनाडु) — शिव पुराण के अनुसार लंका जाने से पहले श्रीराम ने समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित करके शिव की पूजा की और विजय का आशीर्वाद माँगा। शिव प्रकट हुए और राम की विनती पर वहीं रामेश्वर नाम से बस गए। इस तरह यह स्थान राम और शिव, दोनों की भक्ति का संगम है।
घृष्णेश्वर (एलोरा के पास, महाराष्ट्र) — घुश्मा नाम की भक्त रोज़ एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजती और तालाब में विसर्जित करती थी। उसकी बहन सुदेहा ने ईर्ष्या में उसके बेटे को मारकर उसी तालाब में फेंक दिया। घुश्मा ने रोते हुए भी पूजा नहीं छोड़ी। उसका बेटा तालाब से जीवित लौट आया। शिव सुदेहा को दंड देने लगे, पर घुश्मा ने अपनी बहन के लिए माँगी।
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥
परली में वैद्यनाथ, डाकिनी में भीमाशंकर, सेतुबंध पर रामेश्वर, दारुका वन में नागेश्वर, वाराणसी में विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर त्र्यंबकेश्वर, हिमालय में केदारनाथ और शिवालय में घृष्णेश्वर।
— द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र
आज के जीवन में सीख
घुश्मा ने दुख में भी न श्रद्धा छोड़ी, न बदले की भावना रखी। सबसे बड़ी भक्ति वह है जो हमें क्षमा करना सिखाए।
सभी अध्याय
- 1शिव पुराण क्या है?
- 2अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
- 3शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
- 4सती और दक्ष का यज्ञ
- 5वीरभद्र और दक्ष के यज्ञ का विनाश
- 6तारकासुर का वरदान और कामदेव का भस्म होना
- 7पार्वती की तपस्या
- 8शिव-पार्वती विवाह
- 9कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध
- 10गणेश का जन्म और हाथी का सिर
- 11त्रिपुरासुर और एक बाण
- 12नीलकंठ — जब शिव ने विष पिया
- 13गंगा का अवतरण — शिव की जटा में
- 14मार्कंडेय और काल पर विजय
- 15किरात और अर्जुन
- 16शिव के रूप — अर्धनारीश्वर और नटराज
- 17शिकारी और पहली शिवरात्रि
- 18बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 1
- 19बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2