दशम स्कंध · अध्याय 20
जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
अब तक की कहानी
उद्धव व्रज से लौट आए हैं। कंस के मरने के बाद उसके ससुर जरासंध के मन में बदले की आग जल रही है।
कंस की दो रानियाँ, अस्ति और प्राप्ति, मगध के शक्तिशाली राजा जरासंध की बेटियाँ थीं। पति की मृत्यु के बाद वे रोती हुई पिता के पास गईं। क्रोधित जरासंध ने एक विशाल सेना लेकर मथुरा को घेर लिया।
कृष्ण और बलराम ने उसकी पूरी सेना हरा दी, पर जरासंध को जान-बूझकर ज़िंदा छोड़ दिया। कृष्ण जानते थे कि वह बार-बार धरती के बोझ बने दुष्ट राजाओं को इकट्ठा करके लाएगा और इस तरह उनका अंत होगा। जरासंध ने सत्रह बार हमला किया और हर बार हारा।
अठारहवीं बार जब जरासंध फिर आ रहा था, उसी समय कालयवन नाम का एक और शत्रु तीन करोड़ म्लेच्छ सैनिकों के साथ मथुरा पर चढ़ आया। कृष्ण ने सोचा कि प्रजा को दो तरफ़ से ख़तरा है। उन्होंने समुद्र के बीच विश्वकर्मा से एक सुंदर, सुरक्षित नगरी बनवाई — । और अपनी योगशक्ति से रातोंरात सारी प्रजा को वहाँ पहुँचा दिया।
फिर कृष्ण बिना हथियार के कालयवन के सामने से भागने लगे। कालयवन उनके पीछे-पीछे एक पहाड़ की गुफा में घुस गया। वहाँ राजा मुचुकुंद सो रहे थे, जिन्हें देवताओं ने वरदान दिया था कि जो उन्हें जगाएगा वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मारी, मुचुकुंद जागे और उनकी दृष्टि पड़ते ही कालयवन जलकर राख हो गया।
मुचुकुंद ने कृष्ण के दर्शन किए और तप करने चले गए। जरासंध से युद्ध छोड़कर हटने के कारण कृष्ण को प्यार से रणछोड़ भी कहा जाता है। उन्होंने अपने अहंकार से ज़्यादा प्रजा की सुरक्षा को चुना। अब यदुवंशी द्वारका में सुख से रहने लगे।
आज के जीवन में सीख
हर लड़ाई सामने से लड़नी ज़रूरी नहीं। कभी-कभी पीछे हटना ही सबसे समझदारी भरी जीत होती है।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति