दशम स्कंध · अध्याय 13

माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

पूतना और दूसरे असुरों से बचकर बालक कृष्ण और बलराम गोकुल में बड़े हो रहे हैं।

कृष्ण अब घुटनों के बल चलने लगे थे, फिर दौड़ने भी लगे। उनकी शरारतों से पूरा गोकुल हँसता और परेशान भी होता। गोपियाँ यशोदा के पास शिकायत लेकर आतीं — तुम्हारा लल्ला हमारे घर का चुरा लेता है! ऊँचे छींके पर रखें तो ओखली पर चढ़कर उतार लेता है, ख़ुद खाता है और बंदरों को भी खिलाता है।

यशोदा कृष्ण को डाँटतीं, तो वे इतने भोले बनकर खड़े हो जाते कि माँ का ग़ुस्सा पिघल जाता। गोपियाँ शिकायत करतीं, पर सच यह था कि वे भी चाहती थीं कि कान्हा उनके घर आए।

एक दिन बलराम और दूसरे ग्वाल-बालों ने आकर कहा — माँ, कन्हैया ने मिट्टी खाई है! यशोदा ने कृष्ण का हाथ पकड़ा। कृष्ण बोले — माँ, मैंने मिट्टी नहीं खाई, ये सब झूठ बोल रहे हैं। विश्वास न हो तो मेरा मुँह देख लो। यशोदा ने कहा — खोलो मुँह।

कृष्ण ने मुँह खोला, और यशोदा अवाक रह गईं। उस छोटे से मुँह में उन्हें पूरा ब्रह्मांड दिखा — आकाश, दिशाएँ, पर्वत, समुद्र, सूर्य, चंद्रमा, तारे — और उसी में व्रज और ख़ुद यशोदा भी! वे सोच में पड़ गईं — यह सपना है या भगवान की माया? उन्होंने मन ही मन भगवान को प्रणाम किया।

तभी भगवान ने अपनी योगमाया से फिर उनके मन में माँ की ममता भर दी। यशोदा सब भूल गईं और बेटे को गोद में उठाकर चूमने लगीं। आगे एक और दिन उन्होंने शरारत पर नटखट कान्हा को ओखली से बाँधना चाहा, पर हर रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ जाती। जब माँ थककर पसीने से भीग गईं, तब कृष्ण ने अपने आप को बँध जाने दिया — इसीलिए वे दामोदर कहलाए।

आज के जीवन में सीख

जो पूरे ब्रह्मांड को धारण करता है, वह भी प्रेम की रस्सी से बँध जाता है। भगवान को डर से नहीं, प्रेम से पाया जाता है।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटकालिय नाग का दमन

सभी अध्याय

  1. 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
  2. 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
  3. 3बालक ध्रुव की तपस्या
  4. 4भक्त प्रह्लाद
  5. 5नरसिंह अवतार
  6. 6गजेंद्र मोक्ष
  7. 7समुद्र मंथन और मोहिनी
  8. 8वामन अवतार और राजा बलि
  9. 9मत्स्य अवतार
  10. 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
  11. 11श्रीकृष्ण का जन्म
  12. 12पूतना का उद्धार
  13. 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
  14. 14कालिय नाग का दमन
  15. 15गोवर्धन पर्वत उठाना
  16. 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
  17. 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
  18. 18मथुरा में कंस का अंत
  19. 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
  20. 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
  21. 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
  22. 22स्यमंतक मणि की कथा
  23. 23जरासंध का अंत
  24. 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
  25. 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
  26. 26राजा परीक्षित की मुक्ति

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