दशम स्कंध · अध्याय 21
रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
अब तक की कहानी
कृष्ण ने समुद्र में द्वारका बसाई और यदुवंशी वहाँ सुख से रहने लगे। अब विदर्भ देश से एक संदेश आने वाला है।
विदर्भ के राजा भीष्मक की बेटी रुक्मिणी बहुत गुणवती थीं। घर आने वाले संतों से कृष्ण के गुण सुन-सुनकर उन्होंने मन ही मन कृष्ण को पति मान लिया था। कृष्ण भी उनके गुणों के बारे में जानते थे। पर रुक्मिणी का बड़ा भाई रुक्मी कृष्ण से द्वेष रखता था और बहन का विवाह चेदि के राजा शिशुपाल से तय कर दिया।
रुक्मिणी ने एक भरोसेमंद ब्राह्मण के हाथ कृष्ण को भेजा। उसमें लिखा था — हे भुवनसुंदर, मैंने आपको ही अपना मन सौंप दिया है। विवाह से एक दिन पहले कुल-परंपरा के अनुसार मैं नगर के बाहर देवी अंबिका के मंदिर जाऊँगी। वहीं से आकर मुझे ले जाइए। अगर आप नहीं आए, तो मैं यह जीवन आपके लिए तप में बिता दूँगी।
पत्र पढ़कर कृष्ण तुरंत रथ लेकर विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर चल पड़े। पीछे-पीछे बलराम भी सेना लेकर आए। उधर रुक्मिणी बेचैन थीं — ब्राह्मण अब तक लौटा क्यों नहीं? तभी ब्राह्मण आया और मुस्कुराकर बताया कि कृष्ण आ गए हैं।
विवाह के दिन रुक्मिणी अंबिका माँ की पूजा करके मंदिर से बाहर निकलीं। सबकी आँखों के सामने कृष्ण ने उन्हें अपने रथ पर बिठा लिया और चल पड़े। शिशुपाल, जरासंध और दूसरे राजा पीछे दौड़े, पर बलराम और यादव सेना ने उन्हें रोक दिया।
रुक्मी ने प्रतिज्ञा की थी कि कृष्ण को हराए बिना लौटूँगा नहीं। कृष्ण ने उसे हराया और मारने वाले थे, तब रुक्मिणी ने भाई के प्राणों की विनती की। कृष्ण ने उसे केवल सज़ा के तौर पर आधा सिर मूँडकर छोड़ दिया; बलराम ने उसे बंधन से छुड़ा दिया। द्वारका में बड़े उत्सव के साथ कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह हुआ। रुक्मिणी जी को लक्ष्मी जी का रूप माना जाता है।
आज के जीवन में सीख
रुक्मिणी ने अपने मन की बात साहस और मर्यादा दोनों के साथ कही। और जीत के समय भी उन्होंने भाई के लिए करुणा दिखाई।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति