दशम स्कंध · अध्याय 24
सुदामा और कृष्ण की मित्रता
अब तक की कहानी
कृष्ण अब द्वारकाधीश हैं — महलों, रानियों और वैभव से घिरे हुए। पर उनका एक बचपन का मित्र बहुत ग़रीबी में जी रहा है।
कृष्ण के गुरुकुल के साथी एक ब्राह्मण थे, जिन्हें परंपरा में सुदामा कहा जाता है। वे ज्ञानी, शांत और संतोषी थे, पर बहुत ग़रीब। कई बार घर में खाने को कुछ न होता। उनकी पत्नी ने कहा — आपके मित्र तो द्वारका के राजा हैं, एक बार उनसे मिल आइए। सुदामा माँगने के लिए नहीं, पर मित्र के दर्शन के लिए जाने को तैयार हो गए।
पत्नी ने पड़ोस से माँगकर मुट्ठी भर एक फटे कपड़े में बाँध दिया। फटे कपड़ों में सुदामा द्वारका पहुँचे। महल का वैभव देखकर वे संकोच में थे। पर जैसे ही कृष्ण ने उन्हें देखा, वे रुक्मिणी के पलंग से उठकर दौड़े और मित्र को गले लगा लिया।
कृष्ण ने सुदामा को अपने पलंग पर बिठाया, अपने हाथों से उनके पैर धोए और वह जल सिर पर लगाया। रुक्मिणी जी पंखा झलने लगीं। दोनों मित्र गुरु सांदीपनि के आश्रम के दिन याद करने लगे — कैसे एक बार लकड़ी लाने गए तो आँधी-तूफ़ान में रात भर जंगल में फँसे रहे और सुबह गुरु जी उन्हें ढूँढने आए।
फिर कृष्ण ने हँसकर पूछा — भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है? सुदामा संकोच में पोटली छिपा रहे थे। कृष्ण ने ख़ुद छीनकर एक मुट्ठी चिवड़ा खाया और बोले — यह मुझे बहुत प्रिय है। दूसरी मुट्ठी उठाई तो रुक्मिणी जी ने प्रेम से हाथ थाम लिया — इतना ही बहुत है।
सुदामा ने कुछ नहीं माँगा और सोचते हुए लौटे कि प्रभु ने मुझे धन नहीं दिया, शायद ताकि मैं घमंड में उन्हें भूल न जाऊँ। पर घर पहुँचे तो उनकी झोंपड़ी की जगह सुंदर महल खड़ा था। फिर भी सुदामा पहले जैसे ही विनम्र रहे और जीवन भर भगवान का भजन करते रहे।
आज के जीवन में सीख
सच्ची दोस्ती पद और पैसा नहीं देखती। प्रेम से दी गई छोटी-सी चीज़ भी भगवान को सबसे प्यारी लगती है।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति