दशम स्कंध · अध्याय 16
शरद पूर्णिमा की रास लीला
अब तक की कहानी
गोवर्धन लीला के बाद व्रज के लोग और भी समझने लगे कि कान्हा साधारण बालक नहीं। गोपियों का प्रेम उनके लिए सबसे गहरा था।
शरद ऋतु की पूर्णिमा थी। चाँदनी से वृंदावन जगमगा रहा था और फूल खिले थे। तब कृष्ण ने अपनी बाँसुरी बजाई। उसकी धुन सुनते ही गोपियाँ — कोई दूध दुहती, कोई खाना परोसती, कोई श्रृंगार करती — सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ीं।
कृष्ण ने उनके प्रेम की परीक्षा ली। बोले — रात है, वन में डर है, घर लौट जाओ, अपना कर्तव्य निभाओ। गोपियाँ रो पड़ीं और बोलीं — हमारा मन तो तुममें बसा है, हमारे पैर तुम्हारे चरणों से एक कदम भी पीछे नहीं हटते। उनके निःस्वार्थ प्रेम से प्रसन्न होकर कृष्ण उनके साथ यमुना-तट पर विहार करने लगे।
पर जब गोपियों के मन में थोड़ा-सा आया कि कृष्ण केवल हमारे हैं, तो कृष्ण अचानक अंतर्ध्यान हो गए। गोपियाँ व्याकुल होकर पेड़ों, बेलों और हिरनों से पूछती फिरीं — क्या तुमने हमारे श्याम को देखा है? फिर वे यमुना किनारे बैठकर करुण स्वर में गाने लगीं — यही गोपी गीत है।
उनकी सच्ची पुकार सुनकर कृष्ण मुस्कुराते हुए फिर प्रकट हो गए। फिर रास आरंभ हुआ — गोपियों के मंडल में कृष्ण ने इतने रूप धर लिए कि हर दो गोपियों के बीच एक कृष्ण थे, और हर गोपी को लगा कि कान्हा उसी के साथ हैं। आकाश से देवता भी फूल बरसाने लगे।
परीक्षित ने पूछा कि इस लीला का अर्थ क्या है। शुकदेव जी ने समझाया — यह शरीर का नहीं, आत्मा का परमात्मा से मिलन है। गोपियों का प्रेम पूरी तरह निःस्वार्थ था; उसमें अपने सुख की इच्छा नहीं, केवल कृष्ण के सुख की चाह थी। इसलिए भक्ति-परंपरा में गोपियों को प्रेम-भक्ति का सबसे ऊँचा आदर्श माना जाता है।
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि। दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥
हे प्रियतम, तुम्हारे जन्म से व्रज की महिमा बढ़ गई है, लक्ष्मी जी भी यहाँ सदा बसती हैं। पर तुम्हारी गोपियाँ, जिनके प्राण तुम्हीं में अटके हैं, तुम्हें हर दिशा में खोज रही हैं — हमें दर्शन दो।
— गोपी गीत, श्रीमद्भागवत 10.31.1
आज के जीवन में सीख
प्रेम में 'मैं' जितना कम होता है, भगवान उतने पास होते हैं। सच्चा प्रेम पाने से ज़्यादा देने में खुश होता है।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति