प्रथम स्कंध · अध्याय 1
व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
अब तक की कहानी
यह श्रीमद्भागवत की शुरुआत है। वेदों को बाँटने और महाभारत लिखने के बाद भी महर्षि वेदव्यास के मन में एक खालीपन था।
महर्षि वेदव्यास ने लोगों की भलाई के लिए वेदों को चार भागों में बाँटा, पुराण रचे और महाभारत जैसा महान ग्रंथ लिखा। फिर भी एक दिन सरस्वती नदी के किनारे अपने आश्रम में बैठे-बैठे उन्हें लगा कि मन पूरा भरा नहीं है। इतना सब करने के बाद भी कुछ अधूरा क्यों लग रहा है?
उसी समय वीणा बजाते हुए देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। व्यास जी ने अपने मन की बात कही। नारद जी मुस्कुराए और बोले — आपने धर्म, कर्म और ज्ञान के बारे में बहुत लिखा है, पर भगवान की लीलाओं और उनके गुणों का खुलकर गान नहीं किया। जिस रचना में हरि का यश नहीं, उससे आत्मा को सच्चा संतोष नहीं मिलता।
फिर नारद जी ने अपने पिछले जन्म की कथा सुनाई। वे एक दासी के बेटे थे। बचपन में उन्होंने चातुर्मास में ठहरे संतों की सेवा की, उनकी अनुमति से उनका बचा हुआ प्रसाद खाया और उनसे भगवान की कथाएँ सुनीं। इसी से उनके मन में भक्ति का बीज पड़ गया।
माँ के जाने के बाद बालक नारद वन में जाकर ध्यान करने लगे। एक क्षण के लिए भगवान उनके हृदय में प्रकट हुए और फिर छिप गए। एक दिव्य वाणी ने कहा — इस जन्म में तुम मुझे फिर नहीं देख पाओगे, पर यह झलक तुम्हारे प्रेम को बढ़ाएगी। अगले कल्प में वे ब्रह्मा जी के पुत्र नारद बनकर जन्मे।
नारद जी की बात सुनकर व्यास जी ने ध्यान लगाया और श्रीमद्भागवत की रचना की — भगवान की कथाओं से भरा ग्रंथ। यही ग्रंथ उन्होंने अपने पुत्र शुकदेव जी को पढ़ाया, जिन्होंने आगे चलकर इसे राजा परीक्षित को सुनाया।
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥
ये सब अवतार भगवान के अंश और कला हैं, पर श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान हैं। जब-जब संसार दुष्टों से दुखी होता है, ये युग-युग में आकर उसे सुख देते हैं।
— श्रीमद्भागवत 1.3.28
आज के जीवन में सीख
बहुत कुछ पा लेने के बाद भी अगर मन खाली लगे, तो शायद उसमें प्रेम और भक्ति की जगह खाली है। अच्छी संगत छोटे से बीज को बड़ा पेड़ बना देती है।
सभी अध्याय
- 1व्यास जी की बेचैनी और नारद जी की सीख
- 2राजा परीक्षित का श्राप और शुकदेव जी का आगमन
- 3बालक ध्रुव की तपस्या
- 4भक्त प्रह्लाद
- 5नरसिंह अवतार
- 6गजेंद्र मोक्ष
- 7समुद्र मंथन और मोहिनी
- 8वामन अवतार और राजा बलि
- 9मत्स्य अवतार
- 10राजा अंबरीष और दुर्वासा ऋषि
- 11श्रीकृष्ण का जन्म
- 12पूतना का उद्धार
- 13माखन चोर और यशोदा को ब्रह्मांड दर्शन
- 14कालिय नाग का दमन
- 15गोवर्धन पर्वत उठाना
- 16शरद पूर्णिमा की रास लीला
- 17अक्रूर जी का आगमन और वृंदावन से विदाई
- 18मथुरा में कंस का अंत
- 19उद्धव जी और गोपियों का प्रेम
- 20जरासंध के आक्रमण और द्वारका का निर्माण
- 21रुक्मिणी जी का संदेश और विवाह
- 22स्यमंतक मणि की कथा
- 23जरासंध का अंत
- 24सुदामा और कृष्ण की मित्रता
- 25उद्धव गीता — कृष्ण का अंतिम उपदेश
- 26राजा परीक्षित की मुक्ति