ऐतरेय उपनिषद · अध्याय 10
सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
अब तक की कहानी
तैत्तिरीय उपनिषद ने पाँच कोश और गुरु का अंतिम उपदेश दिया। अब ऋग्वेद का ऐतरेय उपनिषद बताता है कि संसार और मनुष्य कैसे बने।
ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद से है। यह कहता है — आरंभ में केवल आत्मा ही था, और कुछ भी नहीं। उसने सोचा, 'मैं लोकों की रचना करूँ।' और उसने लोक बनाए। फिर सोचा, 'लोकों की रक्षा करने वाले भी हों।' तब उसने एक विराट पुरुष को आकार दिया, और उससे अग्नि, वायु, सूर्य जैसे देवता प्रकट हुए।
पर देवताओं को रहने के लिए एक घर चाहिए था। आत्मा उनके लिए एक गाय लाया — देवता बोले, 'यह हमारे लिए काफ़ी नहीं।' फिर घोड़ा लाया — 'यह भी काफ़ी नहीं।' अंत में वह मनुष्य लाया। देवता प्रसन्न होकर बोले, 'यह बहुत सुंदर बना है!' सचमुच, मनुष्य को ही सबसे सुंदर रचना कहा गया।
फिर हर देवता ने मनुष्य के शरीर में अपनी जगह ली। अग्नि वाणी बनकर मुँह में आए। वायु प्राण बनकर नाक में। सूर्य दृष्टि बनकर आँखों में। दिशाएँ सुनने की शक्ति बनकर कानों में। चंद्रमा मन बनकर हृदय में। भूख और प्यास ने भी जगह माँगी, तो उन्हें इन्हीं देवताओं में हिस्सा मिला — इसीलिए जब किसी देवता को आहुति दी जाती है, भूख-प्यास भी उसमें भागी होते हैं।
तब आत्मा ने सोचा — 'यह शरीर मेरे बिना कैसे चलेगा?' और वह सिर के ऊपर की सीमा (ब्रह्मरंध्र) को खोलकर स्वयं शरीर में प्रवेश कर गया। यानी हमारे भीतर सारी इंद्रियाँ देवताओं की शक्ति हैं, पर उन्हें चलाने वाला, सबके पीछे बैठा चेतन स्वयं आत्मा है।
अंत में उपनिषद पूछता है — यह आत्मा कौन है जिससे हम देखते, सुनते, सूँघते, बोलते और स्वाद पहचानते हैं? उत्तर है — वह है, शुद्ध चेतना। सब कुछ — देवता, मनुष्य, पशु, पेड़, पहाड़ — प्रज्ञान से चलते हैं, प्रज्ञान में टिके हैं। और यही प्रसिद्ध महावाक्य है: 'प्रज्ञानं ब्रह्म' — चेतना ही ब्रह्म है।
प्रज्ञानं ब्रह्म
चेतना ही ब्रह्म है।
— ऐतरेय उपनिषद 3.1.3 (महावाक्य)
आज के जीवन में सीख
मनुष्य का जीवन देवताओं ने भी 'सुंदर रचना' कहकर सराहा था। अपनी आँख, कान, वाणी को दिव्य उपहार समझकर अच्छे कामों में लगाओ।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा