छांदोग्य उपनिषद · अध्याय 12
श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
अब तक की कहानी
सत्यकाम ने सच्चाई और सेवा से ब्रह्मज्ञान पाया। छांदोग्य उपनिषद में एक और कथा है — एक घमंडी विद्यार्थी और उसके धैर्यवान पिता की।
ऋषि उद्दालक आरुणि का पुत्र था श्वेतकेतु। बारह वर्ष की उम्र में उसे गुरु के पास पढ़ने भेजा गया। चौबीस वर्ष की उम्र में वह सारे वेद पढ़कर लौटा — पर साथ में बहुत भी लेकर। वह ख़ुद को बड़ा विद्वान समझने लगा था। पिता ने यह देखा और प्यार से पूछा, 'बेटा, क्या तुमने वह विद्या पूछी, जिससे बिना सुना सुना हुआ, बिना सोचा सोचा हुआ, और बिना जाना जाना हुआ हो जाता है?'
श्वेतकेतु हैरान हुआ — 'ऐसी विद्या कैसी होती है?' पिता ने समझाया — 'जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी से बनी हर चीज़ जानी जाती है। घड़ा, सकोरा, दीया — ये बस अलग-अलग नाम हैं; सच तो मिट्टी ही है। वैसे ही सोने के एक टुकड़े को जानकर सारे गहने जाने जाते हैं।' श्वेतकेतु विनम्र होकर बोला, 'मेरे गुरु यह नहीं जानते होंगे, वरना ज़रूर बताते। आप ही सिखाइए।'
पिता ने कहा, 'बरगद का एक फल लाओ।' श्वेतकेतु लाया। 'इसे तोड़ो। क्या दिखता है?' 'बहुत छोटे-छोटे बीज।' 'एक बीज तोड़ो। अब क्या दिखता है?' 'कुछ भी नहीं, पिताजी।' पिता ने कहा, 'बेटा, जिस सूक्ष्म तत्त्व को तुम देख नहीं पा रहे, उसी से यह विशाल बरगद खड़ा है। श्रद्धा रखो।'
एक और दिन पिता ने कहा, 'इस नमक को पानी में डालकर सुबह मेरे पास आना।' सुबह पिता ने कहा, 'नमक निकालकर दो।' श्वेतकेतु को नमक कहीं नहीं मिला — वह घुल चुका था। 'ऊपर से चखो।' 'नमकीन है।' 'बीच से?' 'नमकीन।' 'नीचे से?' 'नमकीन।' पिता बोले, 'वैसे ही वह सत्य इस शरीर में और सारे संसार में घुला हुआ है — दिखता नहीं, पर हर जगह है।'
हर उदाहरण के अंत में उद्दालक एक ही बात कहते — वह सूक्ष्म तत्त्व, जो सबकी आत्मा है, वही सत्य है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु, '' — वह तुम हो। यह वाक्य उपनिषद में नौ बार दोहराया गया है और चार महावाक्यों में से एक है। अर्थ यह कि जिस ईश्वर को तुम बाहर खोजते हो, वह तुम्हारे भीतर भी है — और वही हर किसी के भीतर है।
तत्त्वमसि
वह (परम सत्य) तुम हो।
— छांदोग्य उपनिषद 6.8.7 (महावाक्य)
आज के जीवन में सीख
बहुत पढ़ लेने से कोई ज्ञानी नहीं बनता; विनम्रता से ही असली सीख शुरू होती है। और जो सच तुम्हारे भीतर है, वही सामने वाले के भीतर भी है।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा