छांदोग्य उपनिषद · अध्याय 11
सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
अब तक की कहानी
ऐतरेय उपनिषद ने बताया कि चेतना ही ब्रह्म है। अब छांदोग्य उपनिषद की एक प्यारी कथा — एक बालक जिसकी सबसे बड़ी पूँजी उसकी सच्चाई थी।
छांदोग्य उपनिषद सामवेद से है और सबसे बड़े उपनिषदों में से एक है। इसमें एक बालक सत्यकाम की कथा है। सत्यकाम पढ़ना चाहता था, और उस समय गुरुकुल में प्रवेश के लिए पूछा जाता था। उसने अपनी माँ जबाला से पूछा, 'माँ, मेरा गोत्र क्या है?'
माँ ने सच्चाई से उत्तर दिया — 'बेटा, जवानी में मैं दासी बनकर बहुत घरों में सेवा करती रही, उसी समय तुम्हारा जन्म हुआ। मुझे नहीं पता तुम्हारा गोत्र क्या है। मेरा नाम जबाला है, तुम्हारा नाम सत्यकाम है। तुम गुरु से कहना कि मैं सत्यकाम जाबाल हूँ।' माँ ने कुछ छिपाया नहीं, और बेटे ने भी कुछ नहीं छिपाया।
सत्यकाम ऋषि हारिद्रुमत गौतम के पास गया और विनम्रता से शिष्य बनने की प्रार्थना की। गुरु ने पूछा, 'तुम्हारा गोत्र क्या है?' सत्यकाम ने माँ की कही हर बात ज्यों की त्यों दोहरा दी। गुरु बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा, 'ऐसी सच्ची बात केवल ब्रह्म का सच्चा खोजी ही कह सकता है। जाओ, समिधा ले आओ। मैं तुम्हें शिष्य बनाऊँगा, क्योंकि तुम सत्य से नहीं डिगे।'
गुरु ने उसे चार सौ दुबली, कमज़ोर गायें सौंपीं। सत्यकाम ने कहा, 'जब तक ये एक हज़ार न हो जाएँ, मैं नहीं लौटूँगा।' वह वर्षों तक वन में गायों की सेवा करता रहा। वहाँ प्रकृति ही उसकी गुरु बन गई — एक दिन झुंड का बैल उससे बोला, फिर अग्नि, फिर एक , और फिर एक जलपक्षी। हर एक ने उसे ब्रह्म का एक-एक भाग सिखाया।
जब गायें एक हज़ार हो गईं, सत्यकाम आश्रम लौटा। गुरु ने उसे देखते ही कहा, 'बेटा, तुम्हारा चेहरा ब्रह्म को जानने वाले की तरह चमक रहा है। तुम्हें किसने सिखाया?' सत्यकाम ने कहा, 'मनुष्यों के अलावा दूसरों ने। पर मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सिखाएँ, क्योंकि गुरु से सीखी विद्या ही सबसे श्रेष्ठ होती है।' गुरु ने उसे वही ज्ञान दिया, और आगे चलकर सत्यकाम स्वयं एक महान ऋषि बने।
आज के जीवन में सीख
सच बोलना कभी-कभी डरावना लगता है, पर वही हमारी सबसे बड़ी पहचान बनता है। सत्यकाम की पहचान उसका कुल नहीं, उसकी सच्चाई थी।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा