तैत्तिरीय उपनिषद · अध्याय 8

भृगु, वरुण और पाँच कोश

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

मांडूक्य ने ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ समझाईं। अब तैत्तिरीय उपनिषद में एक पुत्र अपने पिता से ब्रह्म के बारे में पूछता है।

तैत्तिरीय उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से है। इसके तीसरे भाग, 'भृगु वल्ली', में एक सुंदर कथा है। भृगु वरुणदेव के पुत्र थे। एक दिन वे पिता के पास गए और बोले, 'भगवन्, मुझे ब्रह्म सिखाइए।' वरुण ने सीधा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने बस एक संकेत दिया — 'जिससे ये सब प्राणी पैदा होते हैं, जिससे जीते हैं, और मरकर जिसमें लौट जाते हैं — उसे जानने की इच्छा करो। वही ब्रह्म है। करो।'

भृगु ने तप किया, यानी गहराई से सोचा और ध्यान किया। उन्हें लगा — अन्न ही ब्रह्म है! अन्न से ही प्राणी पैदा होते हैं, अन्न से जीते हैं, और अंत में अन्न (मिट्टी) में ही मिल जाते हैं। वे पिता के पास गए। वरुण ने कुछ नहीं कहा, बस फिर कहा — 'तप से ब्रह्म को जानो।' भृगु समझ गए कि अभी उत्तर अधूरा है।

भृगु ने फिर तप किया और जाना — प्राण ब्रह्म है। फिर लौटे, फिर वही उत्तर मिला। फिर उन्होंने जाना — मन ब्रह्म है। फिर जाना — विज्ञान, यानी समझ और बुद्धि, ब्रह्म है। हर बार पिता ने उन्हें और गहराई में भेजा। अंत में भृगु ने जाना — आनंद ही ब्रह्म है। आनंद से ही प्राणी पैदा होते हैं, आनंद से जीते हैं, और आनंद में ही लौट जाते हैं। इस बार पिता को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

ध्यान दीजिए, यह पाँच सीढ़ियाँ वही हैं जिन्हें उपनिषद के दूसरे भाग में पाँच कहा गया है। जैसे तलवार म्यान में होती है, वैसे ही आत्मा पाँच परतों में ढका है। सबसे बाहर अन्नमय कोश — भोजन से बना शरीर। उसके भीतर प्राणमय कोश — साँस और जीवन-शक्ति। फिर मनोमय कोश — मन और भावनाएँ।

उसके भीतर विज्ञानमय कोश — बुद्धि और विवेक। और सबसे भीतर आनंदमय कोश — गहरा आनंद। आत्मा इन सबके भी भीतर है, इन सबको रोशनी देता हुआ — जैसे प्याज़ की परतें उतारते-उतारते हम केंद्र तक पहुँचते हैं। भृगु की कथा सिखाती है कि सच्चा उत्तर किसी से सुनकर नहीं, ख़ुद खोजकर मिलता है — और एक अच्छा गुरु उत्तर नहीं देता, सही दिशा देता है।

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्

(भृगु ने) जाना कि आनंद ही ब्रह्म है।

— तैत्तिरीय उपनिषद, भृगु वल्ली 3.6

आज के जीवन में सीख

पहला उत्तर अक्सर अधूरा होता है। हार मत मानो — हर बार थोड़ा और गहरा सोचो, जैसे भृगु ने पाँच बार किया।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटगुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव

सभी अध्याय

  1. 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
  2. 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
  3. 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
  4. 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
  5. 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
  6. 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
  7. 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
  8. 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
  9. 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
  10. 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
  11. 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
  12. 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
  13. 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
  14. 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा

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