बृहदारण्यक उपनिषद · अध्याय 13

याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी

पढ़ने का समय 5 मिनट

इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

श्वेतकेतु ने सीखा कि 'तत्त्वमसि' — वह तुम हो। अब सबसे बड़े उपनिषद, बृहदारण्यक, में महान ऋषि याज्ञवल्क्य और उनकी ज्ञान-पिपासु पत्नी मैत्रेयी की कथा।

बृहदारण्यक उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से है। इसका नाम ही बताता है — 'बृहत्' यानी बड़ा, 'आरण्यक' यानी वन में पढ़ा जाने वाला ग्रंथ। इसके सबसे बड़े ऋषि हैं याज्ञवल्क्य। एक बार राजा जनक ने एक हज़ार गायें, जिनके सींगों पर सोना बँधा था, सबसे बड़े ज्ञानी के लिए रखीं। याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्य से कहा, 'इन्हें हाँक ले चलो।' फिर सभा में गार्गी सहित कई विद्वानों ने उनसे कठिन प्रश्न पूछे, और याज्ञवल्क्य ने सबका उत्तर दिया।

याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थीं — मैत्रेयी और कात्यायनी। मैत्रेयी को ब्रह्म-चर्चा में गहरी रुचि थी। एक दिन याज्ञवल्क्य ने कहा, 'मैं अब गृहस्थ जीवन छोड़कर लेने जा रहा हूँ। आओ, अपनी संपत्ति तुम दोनों में बाँट दूँ।'

मैत्रेयी ने एक ऐसा प्रश्न पूछा जो आज भी उतना ही सच्चा है: 'भगवन्, अगर धन से भरी यह पूरी धरती मेरी हो जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?' याज्ञवल्क्य ने कहा, 'नहीं। तुम्हारा जीवन बस धनवानों जैसा हो जाएगा। धन से अमरता की कोई आशा नहीं।' मैत्रेयी बोलीं, 'जिससे मैं अमर न होऊँ, उसका मैं क्या करूँ? आप जो जानते हैं, वही मुझे बताइए।'

याज्ञवल्क्य प्रसन्न हुए और बोले — 'पति पति के लिए प्रिय नहीं होता, आत्मा के लिए प्रिय होता है। पत्नी, पुत्र, धन — कोई भी अपने लिए प्रिय नहीं, आत्मा के कारण प्रिय है।' यानी हर प्रेम के पीछे वही एक आत्मा है। इसलिए उस आत्मा को ही देखना, सुनना, उस पर सोचना और उसका ध्यान करना चाहिए। उसे जान लेने पर सब कुछ जाना जाता है।

इसी उपनिषद में वह प्रार्थना भी है जो आज करोड़ों लोग बोलते हैं — 'असतो मा सद्गमय' — मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। इसी में महावाक्य 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) भी आता है, और ब्रह्म को समझाने की प्रसिद्ध विधि '' भी — यह भी नहीं, यह भी नहीं।

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

— बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28

आज के जीवन में सीख

मैत्रेयी की तरह पूछो — 'इससे मुझे सच में क्या मिलेगा?' जो चीज़ें मन की गहरी प्यास नहीं बुझातीं, उनके पीछे पूरा जीवन मत लगाओ।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटएक ही देव, सबके भीतर छिपा

सभी अध्याय

  1. 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
  2. 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
  3. 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
  4. 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
  5. 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
  6. 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
  7. 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
  8. 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
  9. 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
  10. 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
  11. 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
  12. 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
  13. 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
  14. 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा

पढ़ने की सेटिंग

रंग

अक्षर का आकार