कठ उपनिषद · अध्याय 3
नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
अब तक की कहानी
केन उपनिषद ने दिखाया कि देवताओं की शक्ति भी ब्रह्म से है। अब कठ उपनिषद की प्रसिद्ध कथा — एक बालक जो मृत्यु के देवता से मिलने गया।
कठ उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से है। ऋषि वाजश्रवस ने एक बड़ा यज्ञ किया, जिसमें अपना सब कुछ दान करना होता है। पर वे दान में बूढ़ी, कमज़ोर गायें दे रहे थे — जो पानी पी चुकी थीं, घास खा चुकी थीं, अब दूध भी नहीं देती थीं। उनका छोटा बेटा नचिकेता यह देखकर बेचैन हो गया। उसे लगा — ऐसा दान पुण्य नहीं, धोखा है।
नचिकेता ने पिता से पूछा, 'पिताजी, आप मुझे किसे दान देंगे?' पिता चुप रहे। उसने दूसरी बार पूछा, फिर तीसरी बार। तब पिता ने गुस्से में कह दिया, 'तुझे मैं मृत्यु को देता हूँ!' नचिकेता ने पिता के वचन को सच माना और यमराज के घर चला गया। यमराज घर पर नहीं थे। वह बालक तीन रात बिना खाए-पिए द्वार पर प्रतीक्षा करता रहा।
लौटकर यमराज को बहुत दुख हुआ कि एक ब्राह्मण अतिथि भूखा रहा। उन्होंने कहा, 'तीन रातों के बदले तीन वरदान माँगो।' पहले वरदान में नचिकेता ने माँगा — मेरे पिता का मन शांत हो जाए, वे मुझ पर क्रोध न करें, और लौटने पर मुझे पहचानकर प्रेम से मिलें। यमराज ने प्रसन्न होकर यह दे दिया।
दूसरे वरदान में उसने स्वर्ग दिलाने वाली अग्नि-विद्या पूछी। यमराज ने उसे पूरा यज्ञ समझाया, और नचिकेता ने सब एक बार में दोहरा दिया। यमराज इतने प्रसन्न हुए कि बोले — आज से यह अग्नि तुम्हारे नाम से 'नाचिकेत अग्नि' कहलाएगी। फिर तीसरा वरदान आया, और नचिकेता ने सबसे कठिन प्रश्न पूछा: 'मनुष्य के मरने के बाद कोई कहता है वह रहता है, कोई कहता है नहीं रहता। सच क्या है?'
यमराज ने उसकी ली। 'यह प्रश्न देवताओं को भी कठिन लगा था। कुछ और माँग लो — सौ वर्ष की आयु, पुत्र-पौत्र, गायें, हाथी, सोना, घोड़े, विशाल राज्य, रथों में बैठी सुंदर अप्सराएँ, संगीत — सब ले लो, पर मृत्यु के बारे में मत पूछो।' नचिकेता ज़रा भी नहीं डगमगाया। उसने कहा, 'ये सब कल तक रहने वाली चीज़ें हैं, ये इंद्रियों का तेज़ भी घटा देती हैं। ये घोड़े, ये नाच-गाना आप ही रखिए। धन से मनुष्य कभी तृप्त नहीं होता। मुझे तो वही वरदान चाहिए।'
यमराज समझ गए कि यह बालक सच्चा है। जिसे कोई भी लालच सत्य के मार्ग से न हटा सके, वही इस ज्ञान का अधिकारी है। और तब मृत्यु के देवता ने स्वयं एक बालक को आत्मा का रहस्य सिखाना शुरू किया — जो अगले अध्याय में है।
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः
मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं होता।
— कठ उपनिषद 1.1.27
आज के जीवन में सीख
सही प्रश्न पूछने का साहस रखो, और जब लालच सामने आए तो अपने लक्ष्य से मत हटो। नचिकेता की तरह — जो सच है, वही माँगो।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा