मुंडक उपनिषद · अध्याय 6

दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते

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प्रश्न उपनिषद में छह शिष्यों ने ऋषि पिप्पलाद से प्रश्न पूछे। अब मुंडक उपनिषद में एक गृहस्थ एक ही बड़ा प्रश्न लेकर आता है।

मुंडक उपनिषद अथर्ववेद से है। यह ज्ञान ब्रह्मा जी से अथर्वा को, अथर्वा से अंगिर को, फिर भारद्वाज सत्यवाह को, और उनसे ऋषि अंगिरस को मिला था। एक दिन महान गृहस्थ शौनक विधिपूर्वक अंगिरस के पास गए और पूछा — 'भगवन्, वह क्या है जिसे जान लेने पर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?'

अंगिरस ने कहा — जानने योग्य दो विद्याएँ हैं: और । चारों वेद — ऋग्, यजुः, साम, अथर्व — और शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष — ये सब अपरा विद्या हैं। और परा विद्या वह है जिससे उस अविनाशी को जाना जाता है। सोचिए — वेद भी 'निचली' विद्या में गिने गए! अर्थ यह है कि सारी जानकारी तब तक अधूरी है जब तक हम स्वयं को न जानें।

वह अविनाशी कैसा है? ऋषि ने सुंदर उदाहरण दिए — जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाल बनाती है और फिर उसे समेट लेती है, जैसे धरती से पौधे उगते हैं, जैसे जीवित मनुष्य के शरीर पर बाल उगते हैं, वैसे ही उस अविनाशी से यह संसार निकलता है। आगे एक और चित्र आता है: ॐ धनुष है, आत्मा बाण है, और ब्रह्म लक्ष्य। सावधान होकर निशाना लगाओ और बाण की तरह लक्ष्य में समा जाओ।

फिर आता है उपनिषदों का सबसे प्रसिद्ध चित्र — दो पक्षी। एक ही पेड़ पर दो सुंदर पक्षी बैठे हैं, जो सदा साथ रहने वाले मित्र हैं। एक पक्षी पेड़ के मीठे-कड़वे फल खाता है; दूसरा कुछ नहीं खाता, बस शांत भाव से देखता रहता है। पहला पक्षी हम हैं — सुख-दुख के फल चखते, उलझते, परेशान होते। दूसरा पक्षी हमारे भीतर का साक्षी आत्मा है।

जब फल खाने वाला पक्षी दुखी होकर दूसरे, शांत पक्षी की ओर देखता है और उसकी महिमा पहचानता है, तब उसका सारा शोक मिट जाता है। इसी उपनिषद में वह मंत्र है जो आज भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है — 'सत्यमेव जयते', अर्थात सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं। यह वाक्य हमारे राष्ट्रीय चिह्न के नीचे लिखा रहता है।

सत्यमेव जयते नानृतम्

सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं।

— मुंडक उपनिषद 3.1.6

आज के जीवन में सीख

डिग्रियाँ और जानकारी ज़रूरी हैं, पर ख़ुद को जानना सबसे बड़ी पढ़ाई है। जब मन उलझे, भीतर के शांत 'दूसरे पक्षी' की ओर देखो।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ

सभी अध्याय

  1. 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
  2. 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
  3. 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
  4. 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
  5. 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
  6. 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
  7. 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
  8. 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
  9. 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
  10. 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
  11. 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
  12. 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
  13. 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
  14. 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा

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