ईशावास्य उपनिषद · अध्याय 1

सब कुछ ईश्वर से भरा है

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यह उपनिषदों की यात्रा का पहला अध्याय है। हम सबसे छोटे पर सबसे प्रसिद्ध उपनिषदों में से एक — ईशावास्य से शुरू करते हैं।

ईशावास्य उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम, चालीसवाँ अध्याय है। इसमें केवल अठारह मंत्र हैं, पर कहा जाता है कि पूरा वेदांत इन्हीं में समाया है। इसकी कोई लंबी कहानी नहीं है — यह सीधे दिल से बात करता है। इसका नाम इसके पहले शब्दों से पड़ा है: 'ईशा वास्यम्' — यानी यह सब ईश्वर से ढका, ईश्वर से भरा हुआ है।

पहला मंत्र कहता है कि इस बदलते संसार में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर बसा है। इसलिए के भाव से भोगो, और किसी के धन का लालच मत करो। इसका अर्थ यह नहीं कि सब छोड़कर जंगल चले जाओ। अर्थ यह है कि चीज़ों को अपना मालिक मत बनने दो। जो चीज़ पकड़कर नहीं रखी जाती, उसका आनंद ही सच्चा होता है।

दूसरा मंत्र कहता है कि यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो। यानी उपनिषद आलस्य या भागने की नहीं, काम करते रहने की बात करता है — पर ऐसे कि कर्म हमें बाँधें नहीं। यही बात आगे चलकर भगवद गीता में 'निष्काम कर्म' के रूप में और विस्तार से आती है।

छठा मंत्र बहुत सुंदर है: जो सब प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता। सोचिए — अगर हर व्यक्ति में वही एक दिव्यता है, तो किससे नफ़रत करें? यही उपनिषदों का सबसे बड़ा संदेश है: भीतर से हम सब एक हैं।

आगे एक प्रार्थना आती है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन से ढका है — हे सूर्यदेव, उसे हटा दो ताकि मैं सत्य को देख सकूँ। यह सोना चमक-दमक, नाम और धन का प्रतीक माना जाता है, जो सच को ढक लेता है। इस उपनिषद का शांति मंत्र 'पूर्णमदः पूर्णमिदम्' भी बहुत प्रसिद्ध है — पूर्ण से पूर्ण निकालने पर भी पूर्ण ही बचता है।

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

इस संसार में जो कुछ भी चलता-बदलता है, वह सब ईश्वर से भरा है। इसलिए त्याग के भाव से भोगो और किसी के धन का लालच मत करो।

— ईशावास्य उपनिषद, मंत्र 1

आज के जीवन में सीख

चीज़ों का आनंद लो, पर उन्हें पकड़कर मत बैठो। जो हर किसी में ईश्वर देखता है, उसके मन में नफ़रत के लिए जगह नहीं बचती।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटयक्ष और देवताओं का अहंकार

सभी अध्याय

  1. 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
  2. 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
  3. 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
  4. 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
  5. 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
  6. 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
  7. 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
  8. 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
  9. 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
  10. 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
  11. 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
  12. 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
  13. 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
  14. 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा

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