प्रश्न उपनिषद · अध्याय 5
छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
अब तक की कहानी
कठ उपनिषद में नचिकेता ने यमराज से आत्मा का ज्ञान पाया। अब छह विद्यार्थी अपने-अपने प्रश्न लेकर एक ऋषि के पास पहुँचते हैं।
प्रश्न उपनिषद अथर्ववेद से है। छह विद्वान युवक — सुकेशा भारद्वाज, शैब्य सत्यकाम, सौर्यायणी गार्ग्य, कौसल्य आश्वलायन, भार्गव वैदर्भि और कबंधी कात्यायन — ब्रह्म को जानने की इच्छा से ऋषि पिप्पलाद के पास गए। वे हाथ में लेकर गए, जो उस समय विनम्र शिष्य का चिह्न था।
ऋषि ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा — 'पहले एक वर्ष यहाँ तप, संयम और श्रद्धा के साथ रहो। फिर जो पूछना हो पूछना; अगर मैं जानता होऊँगा तो सब बताऊँगा।' एक वर्ष बाद एक-एक कर छह प्रश्न पूछे गए। कबंधी ने पूछा — ये सारे प्राणी कहाँ से पैदा होते हैं? ऋषि ने बताया कि प्रजापति ने सृष्टि की इच्छा से तप किया और दो चीज़ें रचीं — रयि (पदार्थ) और प्राण (जीवन)। इन्हीं दोनों के जोड़े से सारा संसार बना।
भार्गव ने पूछा — शरीर को कौन-कौन सी शक्तियाँ थामे रखती हैं, और उनमें सबसे बड़ी कौन है? ऋषि ने एक कथा सुनाई। एक बार वाणी, मन, आँख, कान आदि आपस में झगड़ने लगे कि शरीर को हम थामे हैं। तब शरीर से निकलने लगा — और उसके साथ बाकी सब भी खिंचकर निकलने लगे, जैसे रानी मक्खी के उड़ने पर सारी मधुमक्खियाँ उड़ जाती हैं। सबने हार मानकर प्राण की स्तुति की।
कौसल्य ने पूछा कि प्राण कहाँ से आता है और शरीर में कैसे बँटता है। ऋषि ने कहा — प्राण आत्मा से वैसे ही पैदा होता है जैसे व्यक्ति से उसकी छाया; और वह शरीर में पाँच रूपों में काम करता है, जैसे राजा अलग-अलग गाँवों में अलग अधिकारी रखता है। गार्ग्य ने पूछा — सोते समय कौन सोता है, कौन जागता है, और सपने कौन देखता है? ऋषि ने बताया कि नींद में इंद्रियाँ मन में समा जाती हैं, प्राण जागते रहते हैं, और सपनों में मन ही अपनी महिमा देखता है।
सत्यकाम ने पूछा — जो जीवन भर ॐ का ध्यान करे, उसे क्या मिलता है? ऋषि ने ॐ को ही परम और अपर ब्रह्म बताया, और उसके तीन अक्षरों के ध्यान का फल समझाया। अंत में सुकेशा ने बताया कि कोसल के राजकुमार हिरण्यनाभ ने उनसे 'सोलह कलाओं वाले पुरुष' के बारे में पूछा था। सुकेशा ने ईमानदारी से कहा था, 'मैं नहीं जानता — अगर जानता तो आपको क्यों न बताता? जो झूठ बोलता है, वह जड़ से सूख जाता है।'
पिप्पलाद ने कहा — वह पुरुष कहीं दूर नहीं, इसी शरीर के भीतर है, जिससे ये सोलह कलाएँ निकलती हैं। जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर अपना नाम-रूप खो देती हैं, वैसे ही सब कुछ उसी में मिल जाता है। छहों शिष्यों ने गुरु को प्रणाम कर कहा, 'आप हमारे पिता हैं, जिन्होंने हमें अज्ञान के पार पहुँचाया।'
आज के जीवन में सीख
अच्छा उत्तर पाने के लिए धैर्य और तैयारी चाहिए। और जो नहीं जानते, उसे ईमानदारी से 'मैं नहीं जानता' कहना भी एक बड़ा गुण है।
सभी अध्याय
- 1सब कुछ ईश्वर से भरा है
- 2यक्ष और देवताओं का अहंकार
- 3नचिकेता और यमराज: तीन वरदान
- 4श्रेय और प्रेय, और शरीर का रथ
- 5छह जिज्ञासु, छह प्रश्न
- 6दो विद्याएँ, दो पक्षी और सत्यमेव जयते
- 7ॐ और चेतना की चार अवस्थाएँ
- 8भृगु, वरुण और पाँच कोश
- 9गुरु का अंतिम उपदेश: मातृदेवो भव
- 10सृष्टि की कथा और प्रज्ञानं ब्रह्म
- 11सत्यकाम जाबाल: सच बोलने वाला बालक
- 12श्वेतकेतु और 'तत्त्वमसि'
- 13याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी
- 14एक ही देव, सबके भीतर छिपा