त्योहार व्रत · अध्याय 32

देव उठनी एकादशी की कथा

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चार महीने की योगनिद्रा के बाद भगवान विष्णु इस एकादशी को जागते हैं। इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।

देव उठनी एकादशी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। परंपरा के अनुसार भक्त व्रत रखते हैं, आँगन में चौक पूरकर भगवान के चरण बनाते हैं, गन्ना, सिंघाड़ा, बेर जैसे मौसमी फल चढ़ाते हैं, और थाली या सूप बजाकर गाते हैं — 'उठो देव, जागो देव।' इसी दिन पूरा होता है, और विवाह जैसे शुभ काम फिर से शुरू होते हैं। कई घरों में इसी दिन तुलसी विवाह भी होता है।

आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में जाते हैं, और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं — ऐसी मान्यता है। एक परंपरा इसे राजा बलि से जोड़ती है, जिसे वामन भगवान ने वचन दिया था कि वे साल के कुछ महीने उसके पास रहेंगे।

इस दिन की एक प्रसिद्ध लोक-कथा है। एक राजा के राज्य में एकादशी को सब — प्रजा, नौकर, यहाँ तक कि पशु भी — अन्न नहीं खाते थे। एक दिन दूसरे राज्य से एक व्यक्ति नौकरी माँगने आया। राजा ने शर्त रखी — 'एकादशी को अन्न नहीं मिलेगा।' वह मान गया। पर एकादशी को फल पाकर उसने गिड़गिड़ाकर कहा — 'महाराज, इससे मेरा पेट नहीं भरेगा।' राजा ने उसे आटा-दाल-चावल दे दिए।

वह नदी किनारे गया, खाना बनाया और सच्चे मन से पुकारा — 'आओ भगवान, भोजन तैयार है।' कथा कहती है कि भगवान पीतांबर पहने प्रकट हुए और प्रेम से उसके साथ खाना खाया। अगली एकादशी को वह दुगना अनाज माँगने लगा, क्योंकि 'भगवान भी मेरे साथ खाते हैं।' राजा को विश्वास नहीं हुआ और वह छिपकर देखने गया।

उस दिन भगवान बहुत देर तक नहीं आए। व्यक्ति ने कहा — 'प्रभु, आप नहीं आए तो मैं नदी में कूद जाऊँगा।' जैसे ही वह आगे बढ़ा, भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और उसके साथ भोजन किया। राजा समझ गया कि व्रत-उपवास तभी सार्थक है जब मन में सच्चा भाव हो। उसके बाद राजा ने भी सच्चे मन से भक्ति करना सीखा।

आज के जीवन में सीख

नियम ज़रूरी हैं, पर भगवान सबसे पहले मन का भाव देखते हैं। दिखावे से ज़्यादा सच्चाई मायने रखती है।

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