त्योहार व्रत · अध्याय 20
वट सावित्री व्रत कथा — सावित्री और सत्यवान
अब तक की कहानी
वट सावित्री व्रत की कथा महाभारत के वन पर्व में है, जहाँ मार्कंडेय ऋषि युधिष्ठिर को सावित्री की कहानी सुनाते हैं।
वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास में रखा जाता है — उत्तर भारत में प्रायः ज्येष्ठ अमावस्या को, और महाराष्ट्र-गुजरात में ज्येष्ठ पूर्णिमा को (वट पूर्णिमा)। परंपरा के अनुसार विवाहित स्त्रियाँ उपवास रखकर यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं, उसके चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं, और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं।
मद्र देश के राजा अश्वपति की बेटी सावित्री बहुत गुणी और तेजस्वी थी। जब उसके लिए कोई योग्य वर नहीं मिला, तो पिता ने उसे स्वयं वर खोजने भेजा। लौटकर उसने बताया कि उसने सत्यवान को चुना है — राजा द्युमत्सेन के पुत्र, जिनके पिता अंधे हो चुके थे और राज्य छिन जाने के बाद वन में रहते थे।
वहाँ बैठे नारद मुनि ने कहा — 'सत्यवान में सब गुण हैं, पर एक साल बाद आज ही के दिन उसकी मृत्यु होगी।' पिता ने दूसरा वर चुनने को कहा, पर सावित्री बोली — 'मैंने एक बार मन से चुन लिया, अब बदलूँगी नहीं।' विवाह हुआ, और सावित्री वन में सास-ससुर की सेवा करने लगी। जब दिन पास आया, उसने तीन दिन का कठिन व्रत रखा।
उस दिन वह सत्यवान के साथ लकड़ी काटने जंगल गई। सत्यवान के सिर में दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। तभी यमराज आए और उसके प्राण लेकर दक्षिण की ओर चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे चल दी। यमराज ने लौटने को कहा, पर वह धर्म और सज्जनों की संगति की ऐसी सुंदर बातें करती रही कि यमराज प्रसन्न हो गए।
यमराज ने सत्यवान के जीवन को छोड़कर वर माँगने को कहा। सावित्री ने पहले ससुर की आँखें माँगीं, फिर उनका खोया राज्य, फिर अपने पिता के लिए सौ पुत्र। अंत में उसने माँगा — 'मुझे सत्यवान से सौ पुत्र हों।' यमराज ने 'तथास्तु' कह दिया, और तब समझे कि यह वर सत्यवान के जीवन के बिना पूरा नहीं हो सकता। उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए। परंपरा मानती है कि यह सब वट वृक्ष के नीचे हुआ।
आज के जीवन में सीख
सावित्री ने न डर दिखाया, न ग़ुस्सा — बस धैर्य, समझदारी और अटल निश्चय। सही बात को शांति और बुद्धि से कहना सबसे कठिन दरवाज़े भी खोल देता है।
सभी अध्याय
- 1सोमवार व्रत कथा
- 2सोलह सोमवार व्रत कथा
- 3मंगलवार व्रत कथा (हनुमान जी)
- 4बुधवार व्रत कथा
- 5गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत कथा
- 6शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा
- 7शनिवार (शनि देव) व्रत कथा
- 8रविवार (सूर्य देव) व्रत कथा
- 9सत्यनारायण कथा — पहला और दूसरा अध्याय
- 10सत्यनारायण कथा — तीसरा अध्याय
- 11सत्यनारायण कथा — चौथा और पाँचवाँ अध्याय
- 12प्रदोष व्रत कथा
- 13संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
- 14एकादशी व्रत कथा — एकादशी देवी का जन्म
- 15पूर्णिमा व्रत कथा
- 16मकर संक्रांति की कथा
- 17महाशिवरात्रि व्रत कथा
- 18शीतला अष्टमी (बसौड़ा) व्रत कथा
- 19नवरात्रि व्रत कथा
- 20वट सावित्री व्रत कथा — सावित्री और सत्यवान
- 21निर्जला एकादशी व्रत कथा — भीमसेनी एकादशी
- 22हरियाली तीज व्रत कथा
- 23रक्षा बंधन की कथा
- 24जन्माष्टमी व्रत कथा
- 25हरतालिका तीज व्रत कथा
- 26गणेश चतुर्थी कथा — चंद्रमा और स्यमंतक मणि
- 27ऋषि पंचमी व्रत कथा
- 28करवा चौथ व्रत कथा — वीरावती की कहानी
- 29अहोई अष्टमी व्रत कथा
- 30गोवर्धन पूजा की कथा
- 31छठ पूजा की कथा
- 32देव उठनी एकादशी की कथा
- 33तुलसी विवाह की कथा — वृंदा की कहानी