त्योहार व्रत · अध्याय 26

गणेश चतुर्थी कथा — चंद्रमा और स्यमंतक मणि

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अब तक की कहानी

गणेश चतुर्थी पर चाँद न देखने की परंपरा है। इसके पीछे चंद्रमा की हँसी और श्रीकृष्ण पर लगे झूठे आरोप की कथा है।

गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। परंपरा के अनुसार घरों और पंडालों में गणपति की मूर्ति स्थापित होती है, दूर्वा, लाल फूल और चढ़ाए जाते हैं, और आरती होती है। गणपति डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन विराजते हैं, और अनंत चतुर्दशी तक विसर्जन होता है। इस रात चंद्रमा का दर्शन न करने की परंपरा है।

लोक-परंपरा की कथा है कि एक बार गणेश जी भरपेट मोदक खाकर अपने वाहन मूषक पर जा रहे थे। रास्ते में मूषक लड़खड़ाया और गणेश जी गिर पड़े। यह देखकर चंद्रमा अपने रूप के घमंड में हँस पड़ा। गणेश जी ने कहा — 'जो इस चतुर्थी को तुम्हें देखेगा, उस पर झूठा कलंक लगेगा।' चंद्रमा ने क्षमा माँगी, तो गणेश जी ने श्राप को केवल इसी एक दिन तक सीमित कर दिया।

भागवत पुराण में स्यमंतक मणि की कथा आती है। द्वारका के सत्राजित को सूर्य देव से एक चमकती मणि मिली थी। श्रीकृष्ण ने कहा कि यह मणि राजा उग्रसेन को दे दो, पर सत्राजित नहीं माना। एक दिन उसका भाई प्रसेन वह मणि पहनकर शिकार पर गया। वहाँ एक सिंह ने उसे मार डाला, और सिंह को रीछों के राजा जाम्बवान ने मारकर मणि अपनी गुफा में ले ली।

द्वारका में लोग कहने लगे कि कृष्ण ने मणि के लिए प्रसेन को मार दिया। लोक-परंपरा कहती है कि कृष्ण ने उस चतुर्थी को चाँद देख लिया था, इसलिए यह झूठा कलंक लगा। अपना नाम साफ़ करने के लिए कृष्ण स्वयं खोज में निकले, और निशानों के सहारे जाम्बवान की गुफा तक पहुँचे।

कृष्ण और जाम्बवान में कई दिनों तक युद्ध हुआ। अंत में जाम्बवान ने पहचान लिया कि ये वही प्रभु हैं, जिनकी सेवा उन्होंने रामावतार में की थी। उन्होंने मणि लौटाई और अपनी बेटी जाम्बवती का विवाह कृष्ण से किया। कृष्ण ने सबके सामने मणि सत्राजित को लौटा दी। लज्जित सत्राजित ने अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह कृष्ण से कर दिया। परंपरा है कि भूल से चाँद दिख जाए तो यह कथा सुनी जाती है।

आज के जीवन में सीख

किसी की गिरावट पर हँसना छोटापन है। और जब हम पर झूठा आरोप लगे, तो कृष्ण की तरह शांति से सच सामने लाना ही सबसे अच्छा जवाब है।

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