त्योहार व्रत · अध्याय 18

शीतला अष्टमी (बसौड़ा) व्रत कथा

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

होली के बाद शीतला माता की पूजा होती है, जिसमें ठंडा, बासी भोजन चढ़ाया जाता है। यह अध्याय उसकी लोक-कथा सुनाता है।

शीतला अष्टमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, होली के लगभग आठ दिन बाद मनाई जाती है। कई जगह सप्तमी को भी पूजा होती है। परंपरा है कि भोजन एक दिन पहले बना लिया जाता है और पूजा के दिन घर में चूल्हा नहीं जलता। माता को ठंडे पकवान — पुए, दही, चावल — का भोग लगता है, और परिवार भी वही खाता है। इसलिए इसे कहते हैं।

शीतला माता को गधे पर सवार, हाथ में झाड़ू, कलश और सूप लिए दिखाया जाता है। भक्त मानते हैं कि वे शीतलता देने वाली माता हैं और गर्मी के मौसम में परिवार की रक्षा करती हैं। उनकी प्रसिद्ध लोक-कथा इस प्रकार है।

एक बार शीतला माता एक बूढ़ी स्त्री का रूप धरकर एक गाँव में आईं, यह देखने के लिए कि उन्हें कौन याद करता है। गली से गुज़रते हुए किसी ने ऊपर से उबलते चावल का माँड फेंक दिया। माता के शरीर पर छाले पड़ गए और जलन होने लगी। वे घर-घर जाकर मदद माँगती रहीं, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

आख़िर में एक कुम्हारिन ने उन्हें देखा। उसने आदर से बिठाया, सिर पर ठंडा पानी डाला और कहा — 'माँ, मेरे पास रात की बनी राबड़ी और दही है, यही खा लो।' ठंडा भोजन खाकर माता को शांति मिली। तब उन्होंने अपना असली रूप दिखाया। कुम्हारिन चकित रह गई, क्योंकि उसका घर इतना छोटा था कि माता को बिठाने की जगह भी नहीं थी।

कथा कहती है कि उसी रात गाँव में आग लगी, पर कुम्हारिन का घर बच गया। गाँव वालों ने पूछा तो उसने सारी बात बताई। सबको अपनी भूल का एहसास हुआ। तब से उस गाँव में और फिर दूर-दूर तक लोग शीतला अष्टमी पर ठंडा भोजन चढ़ाने और उस दिन चूल्हा न जलाने लगे।

आज के जीवन में सीख

जो कुम्हारिन सबसे ग़रीब थी, उसी का दिल सबसे बड़ा निकला। किसी अनजान की तकलीफ़ में ठंडा पानी बनना ही सच्ची पूजा है।

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