वन पर्व · अध्याय 19
अर्जुन को पाशुपतास्त्र
अब तक की कहानी
पांडवों का बारह वर्ष का वनवास शुरू हो चुका है। सब जानते हैं कि वनवास के बाद युद्ध हो सकता है।
वन में महर्षि व्यास पांडवों से मिलने आए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा, 'आगे का युद्ध भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों से होगा। अर्जुन को देवताओं से दिव्य अस्त्र प्राप्त करने चाहिए।' युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर अर्जुन अकेले हिमालय की ओर चल पड़े और इंद्रकील पर्वत पर पहुँचे।
वहाँ एक बूढ़े तपस्वी मिले। वे वास्तव में अर्जुन के पिता इंद्र थे। उन्होंने कहा, 'पुत्र, पहले भगवान शिव को प्रसन्न करो, फिर मैं तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा।' अर्जुन ने कठोर तपस्या शुरू की। पहले वे फल खाकर रहे, फिर केवल पत्ते, फिर केवल हवा पीकर, एक पैर पर खड़े होकर शिव का ध्यान करते रहे।
एक दिन मूक नाम का एक दानव जंगली सूअर का रूप लेकर अर्जुन को मारने दौड़ा। अर्जुन ने गांडीव उठाकर बाण चलाया। ठीक उसी समय एक शिकारी ने भी उसी सूअर पर बाण मारा। दोनों बाण एक साथ लगे और सूअर मर गया। अर्जुन ने कहा, 'यह मेरा शिकार था!' किरात ने हँसकर कहा, 'नहीं, पहला बाण मेरा था।'
बात युद्ध तक पहुँच गई। अर्जुन ने बाणों की वर्षा की, पर किरात पर कोई असर नहीं हुआ। उनके अक्षय तरकश के बाण भी ख़त्म हो गए। किरात ने गांडीव भी छीन लिया। अर्जुन ने मुक्कों से लड़ाई की, पर किरात ने उन्हें दबाकर बेहोश कर दिया। होश आने पर अर्जुन ने मिट्टी का एक शिवलिंग बनाया और उस पर फूल चढ़ाए। आश्चर्य! वही फूल किरात के सिर पर दिखाई दिए।
अर्जुन समझ गए — यह किरात स्वयं भगवान शिव थे, और साथ में किरातिन के रूप में माता पार्वती। वे उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगी। शिव ने प्रसन्न होकर कहा, 'मैं तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हूँ।' उन्होंने अर्जुन को अपना महान अस्त्र दिया और चेतावनी दी कि इसे कभी किसी कमज़ोर शत्रु पर न चलाना। इसके बाद अर्जुन इंद्र के साथ स्वर्ग गए और वहाँ अन्य देवताओं से भी दिव्य अस्त्र और संगीत-नृत्य की शिक्षा पाई।
आज के जीवन में सीख
जीत के घमंड से ज़्यादा ज़रूरी है हार को स्वीकार करके झुकना सीखना। जिसने सिर झुकाया, उसी को सबसे बड़ा वरदान मिला।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर