आदि पर्व · अध्याय 7

पांडवों और कौरवों का जन्म

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

पांडु हस्तिनापुर के राजा हैं और कुंती व माद्री उनकी रानियाँ हैं। कुंती के पास दुर्वासा का दिया मंत्र है।

राजा पांडु एक वीर योद्धा थे। एक दिन वन में शिकार करते हुए उन्होंने हिरणों के एक जोड़े पर बाण चला दिया। वह असल में ऋषि किंदम और उनकी पत्नी थे, जो हिरण का रूप लिए हुए थे। मरते हुए ऋषि ने शाप दिया, 'जिस दिन तुम प्रेम से अपनी पत्नी के पास जाओगे, उसी दिन तुम्हारी मृत्यु होगी।' दुखी पांडु ने राज्य धृतराष्ट्र को सौंपा और दोनों रानियों के साथ वन में चले गए।

पांडु को चिंता थी कि उनका वंश कैसे चलेगा। तब कुंती ने उन्हें दुर्वासा के मंत्र के बारे में बताया। पांडु की आज्ञा से कुंती ने धर्मराज को बुलाया और युधिष्ठिर का जन्म हुआ। फिर वायु देव से बलशाली भीम और देवराज इंद्र से अर्जुन जन्मे। कुंती ने यह मंत्र माद्री को भी दिया। माद्री ने अश्विनी कुमारों का ध्यान किया और जुड़वाँ नकुल और सहदेव का जन्म हुआ।

उधर हस्तिनापुर में गांधारी को व्यास से सौ पुत्रों का वरदान मिला था। पर दो वर्ष बीत गए, बच्चे का जन्म नहीं हुआ। जब उन्होंने सुना कि कुंती का पुत्र जन्म ले चुका है, तो दुख और ईर्ष्या में उन्होंने अपने गर्भ पर प्रहार किया। उससे मांस का एक लोथ निकला। व्यास ने आकर उसे एक सौ एक भागों में बाँटा और घी से भरे घड़ों में रखवा दिया।

समय पूरा होने पर घड़ों से सौ पुत्र और एक पुत्री दुःशला जन्मे। सबसे बड़ा था । उसके जन्म के समय गीदड़ रोए और अपशकुन हुए। विदुर ने कहा, 'कुल की भलाई के लिए इस बालक को त्याग दीजिए।' पर पिता का मोह भारी पड़ा, धृतराष्ट्र ऐसा नहीं कर सके। युधिष्ठिर दुर्योधन से कुछ ही समय पहले जन्मे थे, इसलिए वे कुल के सबसे बड़े राजकुमार थे।

वन में पंद्रह वर्ष बीत गए। एक बसंत ऋतु में पांडु माद्री को देखकर मन पर काबू न रख सके, और शाप के अनुसार उनकी मृत्यु हो गई। माद्री ने स्वयं को दोषी माना और पति के साथ हो गईं, अपने दोनों पुत्र कुंती को सौंपकर। वन के ऋषि कुंती और पाँचों बालकों को हस्तिनापुर ले आए। भीष्म ने उनका स्वागत किया। पाँचों भाई अब अपने सौ चचेरे भाइयों के साथ बड़े होने लगे।

आज के जीवन में सीख

ईर्ष्या मन को अंधा कर देती है, और मोह हमें सही सलाह सुनने नहीं देता। बड़े संकट अक्सर ऐसे ही छोटे-छोटे बीजों से उगते हैं।

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सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
  6. 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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