सौप्तिक पर्व · अध्याय 40
ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
अब तक की कहानी
अश्वत्थामा ने रात में सोते हुए पांडव शिविर पर हमला किया और द्रौपदी के पाँचों पुत्रों को मार डाला।
सुबह समाचार मिला तो द्रौपदी शोक से टूट गईं। उन्होंने कहा, 'जब तक अश्वत्थामा को दंड नहीं मिलता और उसके माथे की मणि मेरे सामने नहीं आती, मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगी।' भीम तुरंत रथ लेकर निकल पड़े। श्रीकृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिर भी पीछे गए, क्योंकि कृष्ण जानते थे कि अश्वत्थामा के पास भयानक अस्त्र है।
गंगा के किनारे व्यास जी के आश्रम में अश्वत्थामा बैठा था। पांडवों को देखते ही उसने घास का एक तिनका उठाकर उस पर अस्त्र का आवाहन किया और छोड़ दिया — 'पांडवों का नाश हो!' श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने भी अपना अस्त्र चलाया, ताकि वह उसे शांत कर दे।
दो महा-अस्त्रों की टक्कर से संसार जलने लगा। तब व्यास जी और नारद मुनि दोनों अस्त्रों के बीच आकर खड़े हो गए। अर्जुन ने, जो संयम के साथ जीते थे, तुरंत अपना अस्त्र वापस ले लिया। पर अश्वत्थामा को अस्त्र लौटाना आता ही नहीं था।
उसने अस्त्र की दिशा बदलकर पांडव कुल की स्त्रियों के गर्भ की ओर कर दी — विशेष रूप से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर। श्रीकृष्ण बोले, 'वह बालक मरा हुआ जन्मेगा, पर मैं उसे जीवन दूँगा।' और उन्होंने अश्वत्थामा को शाप दिया कि वह तीन हज़ार वर्ष तक, घावों से भरा, अकेला और बिना किसी साथी के पृथ्वी पर भटकेगा।
अश्वत्थामा ने अपने माथे की मणि निकालकर दे दी और वन चला गया। भीम ने वह मणि द्रौपदी को सौंपी। द्रौपदी ने कहा, 'गुरु का पुत्र मेरे लिए भी आदर योग्य है। मुझे बस न्याय चाहिए था।' उन्होंने मणि युधिष्ठिर को दे दी, जिन्होंने उसे अपने मस्तक पर धारण किया।
आज के जीवन में सीख
शक्ति के साथ संयम ज़रूरी है। जो अपनी ताक़त को रोकना नहीं जानता, वह दूसरों के साथ ख़ुद का भी विनाश करता है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर