भीष्म पर्व · अध्याय 29
युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
अब तक की कहानी
गीता सुनकर अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो गए। दोनों सेनाएँ अब पहले वार की प्रतीक्षा कर रही थीं।
तभी सबने एक अनोखा दृश्य देखा। युधिष्ठिर ने अपना कवच उतारा, हथियार रख दिए और रथ से उतरकर पैदल ही कौरव सेना की ओर चल पड़े। उनके भाई घबरा गए — 'भैया, आप कहाँ जा रहे हैं?' केवल श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि युधिष्ठिर क्या करने जा रहे हैं।
युधिष्ठिर सीधे पितामह भीष्म के पास पहुँचे और उनके चरण छूकर बोले, 'पितामह, हमें आपसे युद्ध करना पड़ रहा है। हमें आज्ञा और आशीर्वाद दीजिए।' भीष्म की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, 'पुत्र, तुमने यदि ऐसा न किया होता तो मैं तुम्हें हार का शाप देता। अब मैं प्रसन्न हूँ — विजय तुम्हारी होगी।'
भीष्म ने आगे कहा, 'मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। कौरवों के अन्न और धन ने मुझे बाँध रखा है, इसलिए मैं उनकी ओर से लड़ूँगा।' यही बात गुरु द्रोण और कुलगुरु कृपाचार्य ने भी कही, और दोनों ने युधिष्ठिर को विजय का आशीर्वाद दिया।
मामा शल्य ने भी आशीर्वाद दिया। युधिष्ठिर ने उनसे एक वचन माँगा — 'जब आप कर्ण के सारथी बनें, तो उसका उत्साह कम करते रहिएगा।' शल्य ने वचन दे दिया।
लौटते समय युधिष्ठिर ने ऊँचे स्वर में कहा, 'जो भी हमारे पक्ष में आना चाहे, आ सकता है।' धृतराष्ट्र के एक पुत्र ने धर्म का साथ चुना और पांडवों की ओर आ गए। आकाश से फूल बरसे और शंख बज उठे — महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ।
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥
मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं। हे राजन, यही सच है — कौरवों ने मुझे धन से बाँध रखा है।
— महाभारत, भीष्म पर्व — भीष्म के वचन
आज के जीवन में सीख
मतभेद हो या मुकाबला, बड़ों का सम्मान नहीं छोड़ना चाहिए। विनम्रता कमज़ोरी नहीं, सबसे बड़ी ताक़त है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर