आदि पर्व · अध्याय 8
गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
अब तक की कहानी
पांडव और कौरव हस्तिनापुर में साथ-साथ बड़े हो रहे हैं। भीम की ताक़त से दुर्योधन मन ही मन जलने लगा है।
एक दिन सारे राजकुमार गेंद से खेल रहे थे। गेंद एक सूखे कुएँ में गिर गई। कोई उसे निकाल नहीं पाया। तभी एक दुबले-पतले ब्राह्मण वहाँ आए। उन्होंने घास के तिनकों को मंत्र से बाण बनाकर एक के पीछे एक जोड़ा और गेंद बाहर खींच ली। बच्चे दंग रह गए और दौड़कर भीष्म को बताया। भीष्म समझ गए — ये महान धनुर्धर द्रोणाचार्य हैं।
द्रोण बहुत गरीब थे। बचपन में राजकुमार द्रुपद उनके मित्र थे, पर राजा बनने के बाद द्रुपद ने मदद माँगने आए द्रोण का अपमान कर दिया था। भीष्म ने द्रोण को सम्मान के साथ राजकुमारों का गुरु नियुक्त किया। द्रोण ने कौरवों और पांडवों को एक साथ धनुष, गदा, तलवार और रथ चलाना सिखाया।
सब शिष्यों में अर्जुन सबसे लगनशील थे। एक रात भोजन करते समय हवा से दीया बुझ गया, फिर भी उनका हाथ अँधेरे में ठीक मुँह तक पहुँचा। अर्जुन ने सोचा — अभ्यास से हाथ बिना देखे काम कर सकता है, तो धनुष क्यों नहीं? उस दिन से वे रात में भी तीर चलाने का अभ्यास करने लगे।
एक दिन द्रोण ने परीक्षा ली। पेड़ की डाल पर लकड़ी की एक चिड़िया रखी और पूछा, 'तुम्हें क्या दिख रहा है?' युधिष्ठिर ने कहा, 'पेड़, आप, मेरे भाई और चिड़िया।' द्रोण ने उन्हें हटा दिया। बाक़ी शिष्यों ने भी ऐसे ही उत्तर दिए। फिर अर्जुन की बारी आई। उन्होंने कहा, 'गुरुदेव, मुझे केवल चिड़िया का सिर दिख रहा है।' प्रचलित कथा में इसे 'चिड़िया की आँख' कहा जाता है।
द्रोण ने कहा, 'चलाओ बाण!' अर्जुन का बाण सीधा पर लगा। द्रोण ने अर्जुन को गले लगा लिया। शिक्षा पूरी होने पर द्रोण ने में माँगा कि शिष्य राजा द्रुपद को बंदी बनाकर लाएँ। अर्जुन ने यह कर दिखाया। द्रोण ने द्रुपद को आधा राज्य लौटा दिया, पर द्रुपद के मन में बदले की आग जल उठी।
आज के जीवन में सीख
सफलता उसे मिलती है जो अपने लक्ष्य के अलावा बाक़ी सब भूल जाए। एकाग्रता और लगातार अभ्यास ही असली गुरुमंत्र है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर