महाप्रास्थानिक पर्व · अध्याय 51
अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
अब तक की कहानी
श्रीकृष्ण अपने धाम लौट गए और द्वारका समुद्र में डूब गई। व्यास जी ने अर्जुन से कहा कि अब पांडवों के भी संसार से जाने का समय आ गया है।
युधिष्ठिर ने परीक्षित को हस्तिनापुर का राजा बनाया और युयुत्सु को उनकी देखरेख सौंपी। फिर पाँचों भाई और द्रौपदी साधारण वल्कल वस्त्र पहनकर निकल पड़े। एक कुत्ता भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। समुद्र के किनारे अग्नि देव प्रकट हुए, और अर्जुन ने गांडीव और अक्षय तरकश जल में छोड़ दिए, जो वरुण देव के थे।
पृथ्वी की परिक्रमा करके वे हिमालय पार कर पर्वत की ओर बढ़े। रास्ते में सबसे पहले द्रौपदी गिरीं। भीम ने पूछा, 'उन्होंने तो कभी पाप नहीं किया?' युधिष्ठिर बोले, 'वे हम सबमें अर्जुन से अधिक प्रेम करती थीं।' और बिना पीछे देखे आगे बढ़ते रहे।
फिर सहदेव गिरे — उन्हें अपनी बुद्धि पर गर्व था। फिर नकुल — अपने रूप पर गर्व के कारण। फिर अर्जुन — उन्होंने कहा था कि एक दिन में सब शत्रुओं को जला देंगे, और दूसरे धनुर्धरों को छोटा समझते थे। अंत में भीम गिरे — बहुत खाने और अपने बल की डींग मारने के कारण। अब युधिष्ठिर के साथ केवल वह कुत्ता बचा था।
तभी इंद्र अपना रथ लेकर आए — 'राजन, स्वर्ग चलिए, आप सशरीर चलेंगे।' युधिष्ठिर बोले, 'मेरे भाइयों और द्रौपदी के बिना नहीं।' इंद्र ने बताया कि वे पहले ही स्वर्ग पहुँच चुके हैं। युधिष्ठिर ने कहा, 'यह कुत्ता मेरा भक्त है, मेरे साथ आया है। यह भी चलेगा।' इंद्र बोले, 'स्वर्ग में कुत्ते का स्थान नहीं। इसे छोड़ दीजिए।'
युधिष्ठिर अडिग रहे — 'जो शरण में आया हो, जो भक्त हो, उसे छोड़ना महापाप है। स्वर्ग के लिए भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा।' उसी क्षण कुत्ता बदल गया — वह स्वयं थे, युधिष्ठिर के पिता। उन्होंने कहा, 'पुत्र, तुमने फिर परीक्षा में सफलता पाई।' और युधिष्ठिर इंद्र के रथ में बैठकर सशरीर स्वर्ग गए।
आज के जीवन में सीख
छोटे-छोटे घमंड भी अंत में भारी पड़ते हैं। और सच्ची वफ़ादारी वह है जो किसी इनाम के बदले भी अपने साथी को न छोड़े।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर