सौप्तिक पर्व · अध्याय 39
अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
अब तक की कहानी
भीम ने दुर्योधन की जंघाएँ तोड़ दीं और पांडव जीत गए। कौरव पक्ष में केवल तीन योद्धा बचे — अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा।
तीनों योद्धा मरते हुए दुर्योधन के पास पहुँचे। पिता द्रोण की छलपूर्ण मृत्यु से जल रहे अश्वत्थामा ने कसम खाई, 'मैं आज ही पांचालों और पांडवों का नाश कर दूँगा।' दुर्योधन ने उसी अवस्था में उसे सेनापति बना दिया।
रात को तीनों एक बरगद के पेड़ के नीचे रुके। कृपाचार्य और कृतवर्मा सो गए, पर अश्वत्थामा जागता रहा। उसने देखा कि एक उल्लू ने अँधेरे में आकर पेड़ पर सोए कौओं को एक-एक कर मार डाला। उसके मन में भयंकर विचार आया — 'सोते हुए शत्रु पर हमला करूँगा।'
कृपाचार्य ने उसे बहुत रोका — 'सोते हुए पर वार करना अधर्म है।' पर अश्वत्थामा नहीं माना। पांडव शिविर के द्वार पर उसे एक विशाल, भयानक प्राणी ने रोका, जिसने उसके सारे अस्त्र निगल लिए। तब अश्वत्थामा ने भगवान शिव की आराधना की और स्वयं को अग्नि में अर्पित करने चला। प्रसन्न होकर शिव ने उसे एक तलवार दी और स्वयं उसके भीतर प्रवेश कर गए।
अश्वत्थामा शिविर में घुसा। उसने सोते हुए धृष्टद्युम्न को लात-घूँसों से मारा, ताकि उसे वीर की मृत्यु न मिले। फिर उसने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों, शिखंडी और अनगिनत सोते हुए योद्धाओं को मार डाला। जो भागे, उन्हें द्वार पर खड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा ने मार दिया। शिविर में आग लगा दी गई।
पांडव, श्रीकृष्ण और सात्यकि उस रात श्रीकृष्ण की सलाह पर शिविर से बाहर थे, इसलिए बच गए। सुबह होने से पहले अश्वत्थामा ने दुर्योधन को यह समाचार सुनाया। दुर्योधन ने संतोष से प्राण छोड़ दिए। जो युद्ध धर्म के नाम पर लड़ा गया था, उसका अंत एक भरी रात में हुआ।
आज के जीवन में सीख
बदले की आग इंसान को उन्हीं जैसा बना देती है जिनसे वह नफ़रत करता है। क्रोध में लिया फ़ैसला अक्सर सबसे बड़ा पाप बन जाता है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर