आश्वमेधिक पर्व · अध्याय 47
आधे सुनहरे नेवले की कथा
अब तक की कहानी
अर्जुन एक वर्ष बाद यज्ञ का घोड़ा लेकर लौटे। हस्तिनापुर में युधिष्ठिर का भव्य अश्वमेध यज्ञ संपन्न हुआ।
यज्ञ बहुत भव्य था। ब्राह्मणों को अपार सोना दान दिया गया, हज़ारों लोगों ने भोजन किया। सब उसकी प्रशंसा कर रहे थे। तभी एक अनोखा नेवला वहाँ आया — उसका आधा शरीर सोने का था। वह यज्ञ-भूमि में लोटा और फिर मनुष्य की आवाज़ में बोला, 'यह यज्ञ कुरुक्षेत्र के एक गरीब ब्राह्मण के मुट्ठी भर सत्तू के दान के बराबर भी नहीं है।'
सब चौंक गए। नेवले ने कथा सुनाई। कुरुक्षेत्र में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और बहू के साथ रहता था। वे खेतों में गिरे दाने बीनकर जीते थे। एक बार भयानक पड़ा। कई दिनों के भूखे परिवार को थोड़ा-सा जौ मिला, जिसका उन्होंने बनाया और चार हिस्से किए।
वे खाने ही वाले थे कि एक भूखा अतिथि द्वार पर आ गया। ब्राह्मण ने अपना हिस्सा उसे दे दिया। अतिथि की भूख नहीं मिटी, तो पत्नी ने अपना हिस्सा दिया, फिर पुत्र ने, फिर बहू ने। ख़ुद भूखे रहकर उन्होंने अतिथि को तृप्त किया।
तब अतिथि ने अपना असली रूप दिखाया — वे स्वयं धर्मदेव थे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारा यह दान हज़ारों यज्ञों से बड़ा है।' और वह परिवार दिव्य विमान में स्वर्ग चला गया। नेवले ने कहा, 'मैं बिल से निकला और वहाँ गिरे सत्तू के कणों में लोटा, तो मेरा आधा शरीर सोने का हो गया।'
'तब से मैं हर बड़े यज्ञ में जाकर लोटता हूँ, कि शायद बाकी आधा भी सोने का हो जाए। पर यहाँ भी नहीं हुआ।' इतना कहकर नेवला चला गया। सबको समझ आया कि दान का मूल्य उसके आकार से नहीं, उसके पीछे के त्याग से तय होता है।
आज के जीवन में सीख
दिखावे का बड़ा दान उतना नहीं, जितना अपनी ज़रूरत छोड़कर दिया गया छोटा दान। देने का असली मोल त्याग में है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर