सभा पर्व · अध्याय 15
राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
अब तक की कहानी
पांडवों ने इंद्रप्रस्थ बसाया है और मय दानव ने वहाँ अद्भुत मय सभा बनाई है।
देवर्षि नारद ने युधिष्ठिर को बताया कि उनके पिता पांडु चाहते थे कि वे यज्ञ करें, जिससे वे सम्राट माने जाएँ। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से सलाह ली। श्रीकृष्ण ने कहा, 'मगध का राजा जरासंध सबसे बड़ी बाधा है। उसने सैकड़ों राजाओं को क़ैद कर रखा है। जब तक वह है, यह यज्ञ नहीं हो सकता।'
श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन ब्राह्मण वेश में मगध गए और जरासंध को कुश्ती के लिए ललकारा। जरासंध ने भीम को चुना। चौदह दिन तक बिना रुके भयंकर कुश्ती चली। अंत में श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम ने जरासंध को बीच से चीर दिया। सारे बंदी राजा मुक्त हुए और उन्होंने युधिष्ठिर का साथ देने का वचन दिया। फिर चारों भाइयों ने चारों दिशाओं में जाकर राजाओं से कर लिया।
राजसूय यज्ञ बड़ी धूमधाम से हुआ। सबसे पहले किसकी पूजा हो — यह प्रश्न उठा। भीष्म ने कहा, 'इस सभा में श्रीकृष्ण सबसे पूज्य हैं।' सहदेव ने श्रीकृष्ण को दी। यह देखकर चेदि का राजा शिशुपाल भड़क उठा। वह श्रीकृष्ण का फुफेरा भाई था, पर उनसे बहुत द्वेष रखता था। उसने भरी सभा में श्रीकृष्ण, भीष्म और पांडवों का घोर अपमान किया।
श्रीकृष्ण शांत रहे। बहुत पहले उन्होंने शिशुपाल की माँ को वचन दिया था कि वे उसके सौ अपराध क्षमा करेंगे। शिशुपाल गालियाँ देता रहा और श्रीकृष्ण गिनते रहे। जैसे ही सौ की सीमा पार हुई, श्रीकृष्ण ने सबको सावधान किया और सुदर्शन चक्र छोड़ा। शिशुपाल का सिर धड़ से अलग हो गया, और सबने देखा कि उसके शरीर से एक तेज निकलकर श्रीकृष्ण में समा गया।
यज्ञ पूरा हुआ, पर दुर्योधन मय सभा में घूमते हुए उलझ गया। एक जगह उसने सूखे फ़र्श को पानी समझकर कपड़े ऊपर उठा लिए, और दूसरी जगह पानी को फ़र्श समझकर तालाब में गिर पड़ा। यह देखकर भीम और सेवक हँस पड़े। पांडवों का वैभव और यह हँसी — दोनों दुर्योधन के मन में काँटे की तरह चुभ गए। वह जलन लेकर हस्तिनापुर लौटा।
आज के जीवन में सीख
धैर्य की भी एक सीमा होती है, पर उसे बड़ा रखना ताक़त की निशानी है। और किसी की गलती पर हँसना छोटी बात लगती है, पर उसके घाव गहरे होते हैं।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर