आदि पर्व · अध्याय 13

द्रौपदी स्वयंवर

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अब तक की कहानी

पांडव ब्राह्मण वेश में एकचक्रा में रह रहे हैं। भीम ने बकासुर को मारकर नगर को बचाया है।

पांचाल के राजा द्रुपद द्रोण से हार का बदला लेना चाहते थे। उन्होंने एक बड़ा यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि से एक तेजस्वी पुत्र, धृष्टद्युम्न, और एक अत्यंत सुंदर पुत्री प्रकट हुई। साँवले रंग के कारण पुत्री का नाम कृष्णा पड़ा, और द्रुपद की बेटी होने से वह द्रौपदी कहलाई। द्रुपद मन ही मन चाहते थे कि उसका विवाह अर्जुन से हो।

द्रुपद ने द्रौपदी का स्वयंवर रखा। शर्त कठिन थी — एक बहुत भारी धनुष पर डोरी चढ़ानी थी और ऊँचे घूमते यंत्र के छेद से पाँच बाण चलाकर निशाना भेदना था। प्रचलित कथाओं में इसे घूमती मछली की आँख कहा जाता है, जिसे नीचे जल में परछाईं देखकर भेदना था। देश-विदेश के राजा आए, पर ज़्यादातर तो धनुष उठा भी न सके।

कुछ कथाओं में आता है कि कर्ण उठे और धनुष पर डोरी चढ़ा दी, पर द्रौपदी ने कहा कि वे सारथी-पुत्र से विवाह नहीं करेंगी, और कर्ण अपमानित होकर लौट गए। तब ब्राह्मणों के बीच से एक युवक उठा — ब्राह्मण वेश में अर्जुन। उन्होंने पल भर में डोरी चढ़ाई और कर दिया। द्रौपदी ने आगे बढ़कर उनके गले में वरमाला डाल दी।

राजा भड़क उठे कि एक ब्राह्मण राजकुमारी को ले जाए! लड़ाई छिड़ गई। अर्जुन ने धनुष से और भीम ने एक पेड़ उखाड़कर सबको रोक दिया। सभा में बैठे श्रीकृष्ण ने उन्हें पहचान लिया और मुस्कुराए। दोनों भाई द्रौपदी को लेकर घर पहुँचे और पुकारा, 'माँ, देखो आज हम क्या लाए हैं!' भीतर से कुंती ने बिना देखे कहा, 'जो भी लाए हो, पाँचों आपस में बाँट लो।'

बाहर आकर कुंती ने द्रौपदी को देखा और चिंता में पड़ गईं। पर माँ का वचन झूठा नहीं हो सकता था। तब महर्षि व्यास आए और बताया कि पिछले जन्म में द्रौपदी ने भगवान शिव से पाँच बार गुणवान पति माँगा था, इसलिए शिव ने उन्हें पाँच पति का वर दिया था। इस प्रकार द्रौपदी का विवाह पाँचों पांडवों से हुआ। उसी समय श्रीकृष्ण पहली बार अपने बुआ के बेटों से मिले, और यहीं से उनकी अटूट शुरू हुई।

आज के जीवन में सीख

सच्ची प्रतिभा वेश बदलकर भी छिपती नहीं। और बड़ों के मुँह से निकला हर शब्द ज़िम्मेदारी से बोलना चाहिए, क्योंकि शब्दों का असर दूर तक जाता है।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटइंद्रप्रस्थ और मय सभा

सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
  6. 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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