भीष्म पर्व · अध्याय 28
विश्वरूप दर्शन
अब तक की कहानी
कुरुक्षेत्र में अर्जुन ने हथियार रख दिए थे। श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, ज्ञान और भक्ति का मार्ग समझा रहे थे — यही संवाद भगवद गीता है।
श्रीकृष्ण की बातें सुनते-सुनते अर्जुन के मन में एक इच्छा जागी। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, 'हे प्रभु, आपने अपनी महिमा बताई। अब यदि मैं योग्य हूँ, तो मुझे अपना वह ईश्वरीय रूप दिखाइए।'
श्रीकृष्ण बोले, 'अर्जुन, इन साधारण आँखों से तुम मुझे उस रूप में नहीं देख सकते। मैं तुम्हें देता हूँ।' और फिर अर्जुन ने वह देखा जो किसी ने पहले नहीं देखा था — हज़ारों सूर्यों जैसा तेज, अनगिनत मुख, अनगिनत भुजाएँ, और एक ही शरीर में समाया पूरा ब्रह्मांड।
अर्जुन ने देखा कि भीष्म, द्रोण, कर्ण और दोनों सेनाओं के अनेक योद्धा उस विराट रूप के मुखों में तेज़ी से समा रहे हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में जाती हैं। अर्जुन काँप उठे और पूछा, 'आप कौन हैं?'
भगवान ने उत्तर दिया, 'मैं काल हूँ — लोकों का नाश करने वाला। तुम युद्ध न भी करो, तब भी ये सब योद्धा नहीं बचेंगे। तुम केवल बनो।' डरे हुए अर्जुन ने बार-बार प्रणाम किया और बचपन से की गई हर हँसी-ठिठोली के लिए क्षमा माँगी।
अर्जुन की विनती पर श्रीकृष्ण ने फिर से अपना सौम्य, मनुष्य रूप धारण कर लिया। गीता के अंत में अर्जुन बोले, 'मेरा मोह नष्ट हो गया। अब मैं वही करूँगा जो आप कहेंगे।' उन्होंने फिर से गांडीव उठा लिया।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और यहाँ लोगों का संहार करने आया हूँ। तुम्हारे बिना भी, सामने खड़े ये योद्धा नहीं बचेंगे।
— भगवद गीता 11.32
आज के जीवन में सीख
हम हर चीज़ को नियंत्रित नहीं करते। अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाना ही हमारे हाथ में है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर