आदि पर्व · अध्याय 6
कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
अब तक की कहानी
पांडु हस्तिनापुर के राजा बने और उनका विवाह कुंती से हुआ। पर कुंती के जीवन में एक रहस्य पहले से छिपा था।
कुंती का असली नाम पृथा था। वे यदुवंशी राजा शूरसेन की बेटी और श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन ने उन्हें अपने निःसंतान मित्र राजा कुंतिभोज को गोद दे दिया। वहीं वे 'कुंती' कहलाईं। एक बार महर्षि कुंतिभोज के महल में ठहरे। वे बहुत क्रोधी स्वभाव के माने जाते थे।
कुंती ने पूरे एक वर्ष तक धैर्य और श्रद्धा से दुर्वासा की सेवा की। ऋषि प्रसन्न हुए और जाते समय उन्हें एक मंत्र दिया। उन्होंने कहा, 'इस मंत्र से तुम जिस भी देवता को बुलाओगी, वे आएँगे और तुम्हें अपने जैसा पुत्र देंगे।' ऋषि जानते थे कि आगे चलकर कुंती को इसकी ज़रूरत पड़ेगी।
कुंती अभी किशोरी ही थीं। एक सुबह उगते सूर्य को देखकर उनके मन में जिज्ञासा जागी — क्या सचमुच यह मंत्र काम करता है? उन्होंने मंत्र पढ़कर सूर्य देव का ध्यान किया। उसी पल तेजस्वी सूर्य देव सामने आ खड़े हुए। कुंती घबरा गईं और बोलीं, 'मैंने तो बस परखने के लिए बुलाया था, आप लौट जाइए।' पर सूर्य देव ने कहा कि मंत्र व्यर्थ नहीं जा सकता।
सूर्य देव के वरदान से कुंती को एक पुत्र हुआ, और उनका कुमारीपन भी बना रहा। बालक जन्म से ही सोने जैसे और कुंडल पहने था और सूर्य जैसा चमकता था। पर अविवाहित कुंती समाज के डर से उसे अपने पास नहीं रख सकीं। रोते हुए उन्होंने बालक को एक टोकरी में रखा और नदी में बहा दिया।
टोकरी बहती हुई गंगा तक पहुँची। वहाँ अंग देश के सारथी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा ने उसे देखा। निःसंतान दंपती ने बालक को भगवान का प्रसाद मानकर अपना लिया। उन्होंने उसका नाम वसुषेण रखा, और माँ राधा के नाम से वह 'राधेय' भी कहलाया। यही बालक आगे चलकर कर्ण के नाम से जाना गया।
आज के जीवन में सीख
जिज्ञासा अच्छी है, पर हर शक्ति के साथ ज़िम्मेदारी आती है। बिना सोचे किया गया एक काम कई ज़िंदगियाँ बदल सकता है।
सभी अध्याय
- 1राजा शांतनु और गंगा
- 2भीष्म प्रतिज्ञा
- 3सत्यवती और महर्षि व्यास
- 4अंबा की कथा
- 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
- 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
- 7पांडवों और कौरवों का जन्म
- 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
- 9एकलव्य की गुरुभक्ति
- 10रंगभूमि में कर्ण
- 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
- 12भीम और हिडिंबा
- 13द्रौपदी स्वयंवर
- 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
- 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
- 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
- 17द्रौपदी की लाज
- 18वनवास की शुरुआत
- 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
- 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
- 21यक्ष प्रश्न
- 22अज्ञातवास और कीचक
- 23उत्तर और बृहन्नला
- 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
- 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
- 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
- 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
- 28विश्वरूप दर्शन
- 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
- 30बाणों की शय्या पर भीष्म
- 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
- 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
- 33घटोत्कच का बलिदान
- 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
- 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
- 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
- 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
- 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
- 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
- 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
- 41गांधारी का शोक और शाप
- 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
- 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
- 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
- 45परीक्षित का जन्म
- 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
- 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
- 48बड़ों का वन-गमन
- 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
- 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
- 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
- 52स्वर्ग में युधिष्ठिर