उद्योग पर्व · अध्याय 26

कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती

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अब तक की कहानी

श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव दुर्योधन ने ठुकरा दिया। युद्ध अब निश्चित है, और कौरवों की सबसे बड़ी आशा कर्ण हैं।

हस्तिनापुर से लौटते समय श्रीकृष्ण ने कर्ण को अपने रथ में बिठा लिया और एकांत में ले गए। उन्होंने धीरे से कहा, 'कर्ण, तुम सारथी के नहीं, कुंती के पुत्र हो। विवाह से पहले सूर्य देव से तुम्हारा जन्म हुआ था। धर्म के अनुसार तुम पांडवों के सबसे बड़े भाई हो।'

श्रीकृष्ण ने आगे कहा, 'पांडवों के पास चलो। युधिष्ठिर स्वयं तुम्हें राजा मानेंगे, भीम-अर्जुन तुम्हारे सेवक होंगे, और यह युद्ध भी टल जाएगा।' कर्ण की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, 'केशव, मैं यह सच जानता हूँ। पर जिस माँ ने मुझे जन्म के दिन बहा दिया, उसके नाम से अब क्या लूँ? माँ राधा ने मुझे पाला, पिता अधिरथ ने अपनाया। और जब सबने मेरा अपमान किया, तब दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया।'

कर्ण बोले, 'दुर्योधन ने मेरे भरोसे युद्ध ठाना है। आज उसे छोड़ दूँ तो मैं कहलाऊँगा। मुझे राज्य नहीं चाहिए। बस इतना वचन दीजिए कि यह सच युधिष्ठिर को अभी न बताएँ, वरना वे राज्य मुझे दे देंगे और मैं उसे दुर्योधन को सौंप दूँगा।' श्रीकृष्ण ने उनकी निष्ठा का सम्मान किया और दोनों विदा हुए।

कुछ दिन बाद कर्ण गंगा किनारे सूर्य की उपासना कर रहे थे। पूजा पूरी होने तक कुंती धूप में चुपचाप पीछे खड़ी रहीं। कर्ण ने मुड़कर प्रणाम किया, 'मैं राधा और अधिरथ का पुत्र कर्ण आपको प्रणाम करता हूँ।' कुंती ने काँपते स्वर में कहा, 'नहीं, तुम मेरे पुत्र हो, मेरे पहले बेटे।' तभी सूर्य देव की आवाज़ आई, 'कुंती सच कह रही हैं, पुत्र।'

कुंती ने कहा, 'अपने भाइयों के पास लौट आओ।' कर्ण बोले, 'माँ, जब मुझे आपकी ज़रूरत थी, तब आप नहीं आईं। आज मैं अपना धर्म नहीं छोड़ सकता। पर आपकी विनती ख़ाली नहीं जाएगी — मैं अर्जुन को छोड़कर आपके किसी पुत्र को नहीं मारूँगा। अर्जुन और मुझमें से एक रहेगा, और आपके पाँच पुत्र हमेशा रहेंगे।' कुंती ने उन्हें गले लगाया, और दोनों भारी मन से अपने-अपने पर लौट गए।

आज के जीवन में सीख

वफ़ादारी और सच के बीच चुनना कभी आसान नहीं होता। कर्ण हमें सिखाते हैं कि जिसने बुरे वक़्त में साथ दिया, उसका साथ निभाना भी एक धर्म है — भले ही उसकी क़ीमत भारी हो।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटकुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट

सभी अध्याय

  1. 1राजा शांतनु और गंगा
  2. 2भीष्म प्रतिज्ञा
  3. 3सत्यवती और महर्षि व्यास
  4. 4अंबा की कथा
  5. 5धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म
  6. 6कुंती का वरदान और कर्ण का जन्म
  7. 7पांडवों और कौरवों का जन्म
  8. 8गुरु द्रोण और चिड़िया की आँख
  9. 9एकलव्य की गुरुभक्ति
  10. 10रंगभूमि में कर्ण
  11. 11लाक्षागृह का षड्यंत्र
  12. 12भीम और हिडिंबा
  13. 13द्रौपदी स्वयंवर
  14. 14इंद्रप्रस्थ और मय सभा
  15. 15राजसूय यज्ञ और शिशुपाल
  16. 16द्यूत क्रीड़ा: जुए का खेल
  17. 17द्रौपदी की लाज
  18. 18वनवास की शुरुआत
  19. 19अर्जुन को पाशुपतास्त्र
  20. 20कर्ण का दान: कवच और कुंडल
  21. 21यक्ष प्रश्न
  22. 22अज्ञातवास और कीचक
  23. 23उत्तर और बृहन्नला
  24. 24श्रीकृष्ण किसके साथ?
  25. 25श्रीकृष्ण का शांति प्रस्ताव
  26. 26कर्ण का सच: श्रीकृष्ण और कुंती
  27. 27कुरुक्षेत्र में अर्जुन का संकट
  28. 28विश्वरूप दर्शन
  29. 29युद्ध से पहले युधिष्ठिर का आशीर्वाद लेना
  30. 30बाणों की शय्या पर भीष्म
  31. 31अभिमन्यु और चक्रव्यूह
  32. 32अर्जुन की प्रतिज्ञा और जयद्रथ वध
  33. 33घटोत्कच का बलिदान
  34. 34'अश्वत्थामा मारा गया' — द्रोण का अंत
  35. 35कर्ण सेनापति बने और भीम की प्रतिज्ञा पूरी हुई
  36. 36कर्ण और अर्जुन का अंतिम युद्ध
  37. 37अठारहवाँ दिन: शल्य और शकुनि का अंत
  38. 38भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध
  39. 39अश्वत्थामा का रात्रि आक्रमण
  40. 40ब्रह्मास्त्र और अश्वत्थामा की मणि
  41. 41गांधारी का शोक और शाप
  42. 42कर्ण का रहस्य और युधिष्ठिर का शोक
  43. 43बाणों की शय्या से भीष्म का उपदेश
  44. 44उत्तरायण में भीष्म का देह-त्याग
  45. 45परीक्षित का जन्म
  46. 46अश्वमेध का घोड़ा और बभ्रुवाहन
  47. 47आधे सुनहरे नेवले की कथा
  48. 48बड़ों का वन-गमन
  49. 49मूसल का शाप और यदुवंश का अंत
  50. 50श्रीकृष्ण का परमधाम गमन और द्वारका का डूबना
  51. 51अंतिम यात्रा और धर्मराज का कुत्ता
  52. 52स्वर्ग में युधिष्ठिर

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