सुंदरकांड · अध्याय 29
अशोक वाटिका में माता सीता
अब तक की कहानी
लंकिनी को हराकर हनुमान जी लंका में प्रवेश कर चुके हैं और रात में महलों में माता सीता को खोज रहे हैं।
हनुमान जी ने रावण के महल का कोना-कोना देखा। सोती हुई सुंदर रानी मंदोदरी को देखकर एक पल को लगा कि शायद यही सीता हैं, पर तुरंत मन ने कहा — श्रीराम से दूर सीता जी ऐसे चैन से नहीं सो सकतीं। रामचरितमानस के अनुसार इसी खोज में उनकी भेंट रावण के छोटे भाई से हुई, जो राम-भक्त थे। उन्होंने अशोक वाटिका का रास्ता बताया।
अशोक वाटिका में एक पेड़ के नीचे हनुमान जी ने उन्हें देखा। दुबला शरीर, एक ही मैला वस्त्र, आँखों में आँसू, और चारों ओर डरावनी राक्षसियाँ। फिर भी उनके चेहरे पर एक तेज था। हनुमान जी समझ गए — यही माता सीता हैं। वे पेड़ की डालियों में छिप गए।
भोर होते ही रावण अपनी रानियों के साथ आया। उसने मीठी बातें कीं, धन-वैभव का लालच दिया, और फिर धमकी दी — एक तय समय-सीमा में मेरी बात न मानी, तो तुम्हारा अंत कर दूँगा। सीता जी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
उन्होंने अपने और रावण के बीच एक रख लिया और उससे बात की, मानो वह तिनके से भी छोटा हो। उन्होंने कहा — तुम श्रीराम के सामने कुछ भी नहीं हो। अपना भला चाहते हो तो मुझे लौटा दो। क्रोधित रावण ने तलवार उठाई, पर रामचरितमानस के अनुसार मंदोदरी ने उसे रोक लिया।
रावण के जाने के बाद राक्षसियाँ सीता जी को डराने लगीं। तब एक बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा ने सबको रोका। उसने अपना सपना सुनाया — एक वानर ने लंका जला दी है, रावण का अंत हो गया है, और विभीषण राजा बने हैं। यह सुनकर राक्षसियाँ डर गईं, और पेड़ पर बैठे हनुमान जी सब सुनते रहे।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
तिनके की आड़ रखकर, अपने परम प्रिय अवधपति श्रीराम को याद करते हुए, वैदेही सीता बोलीं।
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड
आज के जीवन में सीख
डर और लालच दोनों के सामने अपनी बात पर टिके रहना ही असली ताक़त है। सीता जी अकेली थीं, पर कमज़ोर नहीं।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना