सुंदरकांड · अध्याय 32

ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

हनुमान जी ने अशोक वाटिका उजाड़ दी है और रावण के पुत्र अक्षय कुमार का वध कर दिया है।

मेघनाद रावण का सबसे वीर पुत्र था। उसने कभी इंद्र को भी हराया था, इसलिए उसे इंद्रजीत भी कहते थे। वह हनुमान जी से लड़ने आया, पर बहुत देर तक कुछ नहीं कर पाया। तब उसने सबसे बड़ा अस्त्र निकाला — ।

हनुमान जी चाहते तो उसे भी सह जाते, क्योंकि ब्रह्मा जी का वरदान उनके साथ था। पर उन्होंने सोचा — अगर मैं ब्रह्मास्त्र का मान नहीं रखूँगा, तो उसकी महिमा कम होगी। और बंधकर रावण की सभा में जाना भी तो मेरे काम का है। इसलिए वे बँध गए।

राक्षसों ने उन्हें रस्सियों से कसकर बाँधा और घसीटते हुए दरबार में ले गए। वाल्मीकि रामायण में एक सुंदर बात आती है — ब्रह्मास्त्र का बंधन दूसरी रस्सियाँ डालते ही ढीला पड़ गया, पर हनुमान जी ने यह किसी को पता नहीं चलने दिया।

सोने के सिंहासन पर बैठे रावण ने पूछा — तू कौन है? हनुमान जी ने निर्भय होकर कहा — मैं श्रीराम का दूत हूँ। सीता जी को सम्मान से लौटा दो और श्रीराम की शरण में चले जाओ। वे दयालु हैं, तुम्हें क्षमा कर देंगे। नहीं तो तुम्हारा सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

रावण ने गुस्से में आदेश दिया — इस वानर को मार डालो! तब विभीषण खड़े हुए। उन्होंने कहा — महाराज, कहती है कि दूत को मारा नहीं जाता। उसे कोई और दंड दीजिए। रावण ने सोचा, फिर हँसकर कहा — वानरों को अपनी पूँछ बहुत प्यारी होती है। इसकी पूँछ में आग लगा दो।

ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार। जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥

मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चढ़ाया, तब हनुमान जी ने सोचा — अगर मैं ब्रह्मास्त्र को नहीं मानूँगा, तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी।

— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड

आज के जीवन में सीख

सच्चा बलवान वह है जो जानता है कब झुकना है। हनुमान जी ने हार नहीं मानी, बल्कि सम्मान दिया — और उसी से अपना काम भी साधा।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटलंका दहन

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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