उत्तरकांड · अध्याय 48
लव-कुश ने गाई रामायण
अब तक की कहानी
सीता जी वाल्मीकि आश्रम में रह रही हैं, जहाँ उनके जुड़वाँ पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ है।
वाल्मीकि रामायण की शुरुआत में ही बताया गया है कि यह ग्रंथ कैसे बना। एक दिन नदी किनारे वाल्मीकि जी ने क्रौंच पक्षियों का एक जोड़ा देखा। तभी एक शिकारी ने उनमें से एक को मार दिया। साथी पक्षी का विलाप सुनकर ऋषि का हृदय दुख से भर गया, और उनके मुँह से एक श्राप छंद में निकल पड़ा।
वाल्मीकि जी स्वयं चकित थे — दुख से निकला यह वचन एक सुंदर बन गया था। परंपरा इसे संसार की पहली कविता मानती है। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रेरणा दी कि इसी छंद में श्रीराम का पूरा चरित्र लिखें। इस तरह रामायण की रचना हुई।
वाल्मीकि जी ने यही रामायण लव और कुश को सिखाई। दोनों भाई मधुर स्वर में, वीणा के साथ, पूरी कथा गाना सीख गए। उन्हें नहीं पता था कि जिस राम की कथा वे गा रहे हैं, वे उन्हीं के पिता हैं।
उधर श्रीराम ने नैमिषारण्य में किया। यज्ञ में पत्नी का साथ होना ज़रूरी था। श्रीराम ने दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि सीता जी की सोने की मूर्ति अपने पास रखी। (बाद की कुछ कथाओं में लव-कुश द्वारा यज्ञ का घोड़ा पकड़ने और युद्ध की कथा भी आती है, पर वाल्मीकि रामायण में यह नहीं है।)
वाल्मीकि जी लव-कुश को लेकर यज्ञ में आए। दोनों बालक गलियों में और फिर राजसभा में रामायण गाने लगे। सब मंत्रमुग्ध हो गए। श्रीराम ने उन्हें सोना देना चाहा, तो उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया — हम वन में रहते हैं, सोने का क्या करेंगे? धीरे-धीरे श्रीराम को पता चला कि ये बालक सीता जी के पुत्र हैं।
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
हे शिकारी, तुमने प्रेम में डूबे क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तुम्हें बहुत वर्षों तक शांति और प्रतिष्ठा न मिले।
— वाल्मीकि रामायण, बालकांड
आज के जीवन में सीख
दूसरों के दुख को महसूस करने वाला दिल ही सबसे सुंदर रचना करता है। संवेदना हर कला की जड़ है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना