सुंदरकांड · अध्याय 27
सुरसा और सिंहिका
अब तक की कहानी
जामवंत के याद दिलाने पर हनुमान जी ने महेंद्र पर्वत से समुद्र के ऊपर छलाँग लगा दी है।
हनुमान जी आकाश में उड़ रहे थे, तभी समुद्र से पर्वत ऊपर उठा। उसने विनम्रता से कहा, 'आप थक गए होंगे, मुझ पर थोड़ा विश्राम कर लीजिए।'
हनुमान जी ने पर्वत को हाथ से छूकर प्रणाम किया और कहा — श्रीराम का काम पूरा किए बिना मेरे लिए विश्राम कहाँ? और वे आगे बढ़ गए।
फिर देवताओं ने उनकी परीक्षा लेने के लिए नागों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने रास्ता रोककर कहा कि वह उन्हें खा जाएगी। हनुमान जी ने अपना शरीर बड़ा किया, तो सुरसा ने अपना मुँह और बड़ा कर लिया। यह होड़ चलती रही।
तब हनुमान जी ने समझदारी दिखाई। वे अचानक बहुत छोटे बन गए, सुरसा के मुँह में जाकर तुरंत बाहर निकल आए और प्रणाम किया। सुरसा प्रसन्न हुईं और आशीर्वाद दिया — तुम बल और बुद्धि दोनों के धाम हो।
आगे सिंहिका नाम की राक्षसी समुद्र में रहती थी, जो उड़ते जीवों की पकड़कर उन्हें खींच लेती थी। उसने हनुमान जी को भी पकड़ा, पर हनुमान जी ने उसे मार गिराया और समुद्र के पार लंका के तट पर उतर गए।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
श्रीराम का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ?
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड
आज के जीवन में सीख
हर बार ताक़त से नहीं, कभी-कभी समझदारी से रास्ता निकलता है। और आराम का सही समय काम पूरा होने के बाद है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना