अरण्यकांड · अध्याय 14

अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

भरत राम की पादुका लेकर अयोध्या लौट गए और नंदीग्राम में तपस्वी की तरह रहकर राज्य चलाने लगे।

भरत के जाने के बाद राम ने सोचा कि चित्रकूट में अयोध्या के लोग बार-बार आएँगे और यहाँ की यादें भी मन को दुखी करेंगी। इसलिए उन्होंने आगे दक्षिण के वनों में जाने का निश्चय किया। रास्ते में वे महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे। अत्रि ने उन्हें अपने पुत्र की तरह स्नेह दिया।

अत्रि की पत्नी थीं देवी अनसूया — महान तपस्विनी और । कहा जाता है कि एक बार भयंकर सूखे में उनके तप से ही वन में फल-फूल उगे थे और मंदाकिनी नदी बहने लगी थी। सीता ने उन्हें आदर से प्रणाम किया, और अनसूया ने सीता को बेटी की तरह गले लगा लिया।

अनसूया ने सीता से कहा कि पति के साथ वन आने का तुम्हारा निर्णय सचमुच महान है। उन्होंने सीता को सुख-दुख में साथ निभाने, धैर्य रखने और प्रेम से गृहस्थ धर्म निभाने की बातें बताईं। सीता ने विनम्रता से सब सुना और कहा कि राम के साथ रहना ही उनका सबसे बड़ा सुख है।

प्रसन्न होकर अनसूया ने सीता को दिव्य वस्त्र, आभूषण और ऐसा दिया, जो कभी मैला नहीं होता और जिसकी सुगंध कभी नहीं जाती। फिर अनसूया के कहने पर सीता ने अपने स्वयंवर और विवाह की पूरी कथा सुनाई। अनसूया बड़े प्रेम से सुनती रहीं।

अगली सुबह ऋषियों ने राम को आगे के मार्ग के बारे में बताया। उन्होंने चेताया कि आगे है — एक विशाल वन, जहाँ राक्षस ऋषियों को सताते हैं। राम, सीता और लक्ष्मण ने अत्रि और अनसूया से आशीर्वाद लिया और घने वन की ओर चल पड़े।

आज के जीवन में सीख

अनसूया ने अपना अनुभव प्यार से सीता के साथ बाँटा, और सीता ने विनम्रता से सीखा। बड़ों का अनुभव और छोटों की विनम्रता — दोनों मिलें तो रिश्ते सुंदर बनते हैं।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 5 मिनटदंडक वन से पंचवटी तक

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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