अरण्यकांड · अध्याय 18
मारीच और सोने का हिरण
अब तक की कहानी
राम ने अकेले खर, दूषण और चौदह हज़ार राक्षसों का अंत कर दिया। शूर्पणखा रोती हुई लंका में रावण के पास पहुँची।
शूर्पणखा ने भरी सभा में रावण को धिक्कारा — ‘तुम राजा होकर भी सोए हो, और दो मनुष्यों ने तुम्हारी सेना मिटा दी!’ फिर उसने सीता की सुंदरता का ऐसा वर्णन किया कि रावण के मन में सीता को पाने की इच्छा जाग उठी। उसने तय किया कि वह सीता का हरण करेगा।
रावण अपने पुष्पक जैसे आकाश में उड़ने वाले रथ पर बैठकर समुद्र पार मारीच के पास गया। यह वही मारीच था जिसे बरसों पहले राम ने विश्वामित्र के यज्ञ के समय सौ योजन दूर फेंक दिया था। अब वह तपस्वी बनकर रहता था। रावण ने कहा — ‘तुम सोने का हिरण बनकर राम को दूर ले जाओ।’
मारीच काँप उठा। उसने रावण को समझाया — ‘राम से बैर मत लो। मैंने उनका बाण झेला है। मुझे तो हर पेड़ के पीछे राम ही दिखाई देते हैं। यह काम तुम्हारे और पूरी लंका के विनाश का कारण बनेगा।’ पर रावण ने धमकी दी — ‘मना करोगे तो मैं अभी तुम्हें मार डालूँगा।’ मारीच ने सोचा, मरना तो है ही, राम के हाथों मरना बेहतर है।
मारीच ने एक अद्भुत का रूप लिया — सोने जैसा चमकता शरीर, चाँदी जैसे धब्बे और रत्नों जैसे सींग। वह पंचवटी की कुटिया के पास चरने लगा। सीता ने उसे देखा तो मोहित हो गईं और राम से बोलीं — ‘इसे मेरे लिए ले आइए।’ लक्ष्मण ने सावधान किया कि यह राक्षसी हो सकती है।
राम ने सीता की इच्छा पूरी करने का निश्चय किया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा — ‘सीता की रक्षा करना, कहीं मत जाना।’ फिर वे धनुष लेकर हिरण के पीछे चल पड़े। हिरण कभी दिखता, कभी छिप जाता और राम को बहुत दूर ले गया। अंत में राम ने बाण चलाया। मरते हुए मारीच ने राम की आवाज़ में पुकारा — ‘हा सीता! हा लक्ष्मण!’
आज के जीवन में सीख
मारीच जानता था कि रास्ता ग़लत है, फिर भी डर के कारण उस पर चल पड़ा। और सोने का हिरण दिखाता है कि जो चीज़ बहुत चमकती है, वह हमेशा सच्ची नहीं होती।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना