लंकाकांड · अध्याय 35
विभीषण की शरणागति
अब तक की कहानी
हनुमान जी सीता जी की चूड़ामणि लेकर लौट आए हैं। श्रीराम विशाल वानर सेना के साथ दक्षिण समुद्र के तट पर पहुँच गए हैं।
लंका में रावण ने सभा बुलाई। ज़्यादातर मंत्री उसकी हाँ में हाँ मिलाते रहे — वानर और मनुष्य हमारा क्या बिगाड़ेंगे? पर विभीषण ने साफ़ कहा — भैया, एक वानर ने अकेले लंका जला दी। सीता जी को लौटा दीजिए और श्रीराम से मित्रता कर लीजिए। इसी में कुल का भला है।
रावण को यह सलाह ज़हर जैसी लगी। उसने विभीषण को कायर और देशद्रोही कहा। रामचरितमानस के अनुसार उसने विभीषण को लात भी मारी। विभीषण ने दुख से कहा — मैं आपका भला चाहता था, अब मैं श्रीराम की शरण में जाता हूँ। और वे अपने चार साथियों के साथ आकाश मार्ग से समुद्र पार चले गए।
विभीषण को आते देख सुग्रीव ने चेताया — यह रावण का भाई है, हो सकता है जासूस हो। दूसरों ने भी अपनी राय दी। हनुमान जी ने कहा — उसकी बातों में सच्चाई दिखती है, और वह सही समय पर सही पक्ष चुनकर आया है।
तब श्रीराम ने वह बात कही जो का सबसे बड़ा वचन मानी जाती है — जो एक बार भी मेरे पास आकर कहे कि मैं आपका हूँ, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर रावण स्वयं भी शरण में आए, तो उसे भी अपनाऊँगा।
विभीषण श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें प्रेम से उठाया, और लक्ष्मण से समुद्र का जल मँगवाकर वहीं विभीषण का लंका के राजा के रूप में अभिषेक कर दिया। युद्ध अभी शुरू भी नहीं हुआ था, पर श्रीराम का भरोसा अटल था।
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे कि 'मैं आपका हूँ', उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
— वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड
आज के जीवन में सीख
सही बात कहने की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है, फिर भी सच बोलिए। और जो आपके पास भरोसा लेकर आए, उसका दरवाज़ा खुला रखिए।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना