किष्किंधाकांड · अध्याय 25

सीता की खोज और संपाती

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

बाली का अंत हो चुका है। सुग्रीव किष्किंधा का राजा है और अंगद युवराज। अब सीता जी की खोज का वचन निभाना है।

वर्षा ऋतु आ गई थी, इसलिए खोज चार महीने रुकी रही। श्रीराम ने प्रवर्षण पर्वत की गुफा में सीता जी की याद में ये दिन काटे। उधर सुग्रीव राजसुख में अपना वचन भूल गया। वर्षा खत्म होने पर लक्ष्मण क्रोध में किष्किंधा पहुँचे। तारा ने उन्हें शांत किया और सुग्रीव ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी।

अब सुग्रीव ने लाखों वानरों को बुलाया और चारों दिशाओं में खोजी दल भेजे। सबको एक महीने में लौटने का आदेश था। दक्षिण दिशा सबसे कठिन थी, इसलिए उसमें अंगद, हनुमान, जामवंत, नल और नील जैसे वीर गए। श्रीराम ने हनुमान जी को अपनी दी, ताकि सीता जी उन्हें पहचान सकें।

दक्षिण दल ने जंगल, पहाड़ और गुफाएँ छान मारीं। एक अँधेरी गुफा में वे भटक गए, जहाँ तपस्विनी स्वयंप्रभा ने उन्हें भोजन दिया और अपने तप से बाहर समुद्र तट पर पहुँचा दिया। पर तब तक एक महीना बीत चुका था, और सीता जी का कोई पता नहीं था।

अंगद निराश हो गए। खाली हाथ लौटने से अच्छा उन्होंने उपवास करके प्राण त्यागने का निश्चय किया। बातों-बातों में वानरों ने जटायु का नाम लिया, जो सीता जी को बचाते हुए मारे गए थे। पास की गुफा में बैठे एक बूढ़े गिद्ध ने यह सुना। वह जटायु का बड़ा भाई था।

संपाती ने बताया कि बचपन में सूर्य की ओर उड़ते समय उसने छोटे भाई को अपने पंखों से ढक लिया था, और उसके पंख जल गए थे। भाई के लिए तर्पण करने के बाद उसने अपनी तेज़ दृष्टि से देखा — सौ योजन दूर, समुद्र के पार, लंका में अशोक वाटिका में सीता जी बैठी हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार उसी समय संपाती के नए पंख भी उग आए।

आज के जीवन में सीख

जब सब रास्ते बंद लगें, तब भी हिम्मत न छोड़ें। मदद अक्सर वहीं से आती है जहाँ से उम्मीद नहीं होती।

अगला अध्याय · पढ़ने का समय 4 मिनटसमुद्र लाँघने का निश्चय

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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