अरण्यकांड · अध्याय 20
जटायु का बलिदान
अब तक की कहानी
लक्ष्मण के जाते ही रावण साधु के वेश में आया और सीता को ज़बरदस्ती रथ में बिठाकर आकाश में ले उड़ा। सीता की पुकार सुनकर जटायु जाग गया।
जटायु बूढ़ा हो चला था, पर उसने देखा कि रावण सीता को ले जा रहा है, तो वह तुरंत रास्ता रोककर खड़ा हो गया। उसने कहा — ‘रावण, मैं साठ हज़ार वर्ष का बूढ़ा हूँ, फिर भी जीते-जी तुम्हें राम की पत्नी को नहीं ले जाने दूँगा। सीता को छोड़ दो।’
रावण ने उसकी बात नहीं मानी। तब जटायु ने उस पर हमला कर दिया। उसने अपनी चोंच और पंजों से रावण का कवच फाड़ दिया, धनुष तोड़ दिया, रथ के गधों को मार गिराया और सारथी को भी। रावण का रथ टूटकर ज़मीन पर आ गया। रावण सीता को गोद में लेकर नीचे कूदा।
पर जटायु बूढ़ा था और लड़ते-लड़ते थक गया। मौक़ा देखकर रावण ने तलवार से जटायु के पंख काट दिए। जटायु ख़ून से लथपथ होकर धरती पर गिर पड़ा। रावण सीता को लेकर फिर आकाश में उड़ गया। रास्ते में सीता ने एक पर्वत पर बैठे पाँच वानरों को देखकर अपने गहने एक कपड़े में बाँधकर नीचे गिरा दिए।
उधर मारीच का अंत करके राम लौट रहे थे। रास्ते में लक्ष्मण मिले, तो राम का मन अनहोनी की आशंका से काँप उठा। कुटिया ख़ाली मिली। राम विलाप करते हुए पेड़ों, नदियों और हिरणों से पूछते रहे — ‘क्या तुमने मेरी सीता को देखा है?’ खोजते-खोजते वे घायल जटायु के पास पहुँचे।
जटायु ने टूटती साँसों में बताया — ‘रावण सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है। मैंने रोकने की कोशिश की, पर रोक न सका।’ इतना कहकर उसने राम की गोद में प्राण त्याग दिए। राम ने जटायु को पिता के समान माना और स्वयं उसका किया। मानस के अनुसार जटायु को भगवान का परम धाम मिला।
आज के जीवन में सीख
जटायु जानता था कि वह जीत नहीं पाएगा, फिर भी अन्याय के सामने चुप नहीं रहा। सही के लिए खड़े होने का साहस उम्र या ताक़त पर निर्भर नहीं करता।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना