बालकांड · अध्याय 6
परशुराम का क्रोध
अब तक की कहानी
राम ने शिव धनुष तोड़ा और सीता से विवाह हुआ। चारों भाइयों का विवाह मिथिला में धूमधाम से हुआ।
शिव धनुष टूटने की गूँज दूर महेंद्र पर्वत तक पहुँची, जहाँ भगवान परशुराम तप कर रहे थे। परशुराम शिव के परम भक्त थे और उन्होंने यह धनुष भी शिव से जुड़ा माना था। वे बहुत क्रोधी स्वभाव के थे और अपने से अनेक अन्यायी राजाओं का अंत कर चुके थे।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब बारात मिथिला से अयोध्या लौट रही थी, तब रास्ते में अचानक आँधी चली और परशुराम सामने आ खड़े हुए। श्रीरामचरितमानस में यह प्रसंग स्वयंवर-सभा में ही होता है। दोनों में परशुराम क्रोध से भरे हुए हैं और पूछते हैं — ‘किसने मेरे गुरु शिव का धनुष तोड़ा?’
मानस में इस प्रसंग का सबसे प्रसिद्ध भाग है परशुराम और लक्ष्मण का संवाद। लक्ष्मण हँसकर कहते हैं कि बचपन में हमने ऐसे कितने ही धनुष तोड़े हैं, एक पुराने धनुष पर इतना क्रोध क्यों? परशुराम और भड़क उठते हैं। तब राम बीच में आकर अत्यंत विनम्र स्वर में कहते हैं — ‘धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा।’
परशुराम ने राम की परीक्षा ली। उन्होंने भगवान विष्णु का धनुष राम को देते हुए कहा — ‘यदि तुम सच में वीर हो, तो इस पर बाण चढ़ाकर दिखाओ।’ राम ने सहज भाव से धनुष लिया, उस पर डोरी चढ़ाई और बाण भी चढ़ा दिया।
उसी क्षण परशुराम समझ गए कि राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं। उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने राम की स्तुति की, उन्हें आशीर्वाद दिया और तप करने वन को लौट गए। बारात आनंद से अयोध्या पहुँची, जहाँ माताओं ने नई बहुओं का स्वागत किया और कुछ समय सबने सुख से बिताया।
आज के जीवन में सीख
लक्ष्मण के तीखे जवाबों ने क्रोध बढ़ाया, राम की विनम्रता ने उसे शांत किया। गुस्से का जवाब गुस्से से नहीं, शांति से दिया जाए तो झगड़ा ख़त्म होता है।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना