लंकाकांड · अध्याय 43

सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा

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अब तक की कहानी

रावण का वध हो चुका है और विभीषण लंका के राजा बने हैं। अब माता सीता को अशोक वाटिका से लाने का समय है।

श्रीराम ने हनुमान जी को विजय का समाचार देने अशोक वाटिका भेजा। सीता जी की आँखों से ख़ुशी के आँसू बहने लगे। हनुमान जी ने कहा — माता, आज्ञा दें तो इन राक्षसियों को दंड दूँ जिन्होंने आपको सताया। सीता जी ने मना कर दिया — वे तो केवल आदेश मान रही थीं। गलती करने वाले पर भी करनी चाहिए।

विभीषण सीता जी को सम्मान के साथ श्रीराम के पास लाए। पूरी सेना उन्हें देखने उमड़ पड़ी। वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम ने सबके सामने कठोर शब्द कहे — मैंने अपना कर्तव्य निभाया और कुल का सम्मान बचाया। एक राजा के रूप में वे संसार के सामने कोई संदेह नहीं छोड़ना चाहते थे।

ये शब्द सीता जी के हृदय में तीर की तरह लगे। उन्होंने शांत पर दृढ़ स्वर में कहा — मेरा मन सदा केवल आपमें ही रहा। फिर उन्होंने लक्ष्मण से चिता तैयार करने को कहा। लक्ष्मण ने दुखी मन से श्रीराम की ओर देखा और चिता सजाई। सीता जी ने अग्नि देव को प्रणाम किया और अग्नि में प्रवेश कर गईं।

सब स्तब्ध थे। तभी अग्नि देव स्वयं सीता जी को गोद में लिए प्रकट हुए। सीता जी बिल्कुल सुरक्षित थीं — न वस्त्र जला, न फूलों की माला मुरझाई। अग्नि देव ने कहा — सीता पूरी तरह पवित्र हैं, इन्हें स्वीकार कीजिए। श्रीराम ने कहा — मुझे कभी संदेह नहीं था, पर संसार को यह देखना ज़रूरी था। वाल्मीकि रामायण में इसी समय स्वर्ग से राजा दशरथ भी आशीर्वाद देने आते हैं।

रामचरितमानस में यह कथा थोड़ी अलग है। उसके अनुसार असली सीता जी हरण से पहले ही अग्नि देव के पास सुरक्षित रख दी गई थीं, और लंका में उनकी रही। अग्नि परीक्षा से असली सीता जी वापस प्रकट हुईं। दोनों परंपराओं में भक्त सीता जी को पवित्रता और आत्म-सम्मान की सबसे ऊँची मूर्ति मानते हैं।

आज के जीवन में सीख

सीता जी ने दुख के बीच भी करुणा नहीं छोड़ी और अपने सम्मान के लिए खुद खड़ी हुईं। अपने सच पर भरोसा रखना सबसे बड़ा साहस है।

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सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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