अयोध्याकांड · अध्याय 9

राम का वनवास

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अब तक की कहानी

कैकेयी ने दो वर माँगे — भरत को राज और राम को चौदह वर्ष का वनवास। राम ने पिता के वचन के लिए वन जाना स्वीकार किया।

राम माता कौसल्या से विदा लेने गए। कौसल्या यह सुनकर बेसुध हो गईं। उन्होंने कहा — ‘यदि पिता ने आज्ञा दी है, तो माता की आज्ञा उससे बड़ी है, मत जाओ।’ पर राम ने प्रेम से समझाया कि पिता के वचन को झूठा करना धर्म नहीं होगा। अंत में माँ ने आँसुओं के साथ आशीर्वाद दिया।

लक्ष्मण क्रोध से भर उठे थे, पर राम ने उन्हें शांत किया। तब लक्ष्मण बोले — ‘आप जहाँ, मैं वहाँ। आपके बिना मैं अयोध्या में नहीं रहूँगा।’ माता सुमित्रा ने बेटे को रोका नहीं, बल्कि आशीर्वाद देकर कहा कि राम को ही पिता और सीता को ही माता मानना। लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला ने भी चुपचाप यह बड़ा त्याग स्वीकार किया।

राम ने सीता को महल में रहने को कहा, क्योंकि वन में काँटे, जंगली जानवर और कठिनाइयाँ थीं। पर सीता बोलीं — ‘पत्नी का स्थान पति के साथ है। आपके साथ वन ही मेरे लिए महल है, और आपके बिना महल भी वन है।’ उनका दृढ़ निश्चय देखकर राम मान गए।

तीनों ने राजसी वस्त्र उतारकर (पेड़ की छाल के वस्त्र) पहने। दशरथ ने रोते हुए विदा दी। सुमंत्र रथ लेकर चले, और पूरी अयोध्या रोती हुई रथ के पीछे दौड़ी। पहली रात तमसा नदी के किनारे बीती। प्रजा भी साथ आ गई थी। राम नहीं चाहते थे कि लोग घर-बार छोड़ें, इसलिए भोर से पहले वे चुपचाप आगे निकल गए।

रथ गंगा के किनारे श्रृंगवेरपुर पहुँचा। वहाँ निषादों के राजा गुह, जो राम के मित्र थे, प्रेम से मिलने आए। गुह ने राज्य और सब सुविधाएँ देनी चाहीं, पर राम ने कहा कि वनवासी को इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। उस रात राम और सीता ने घास के बिछौने पर विश्राम किया, और लक्ष्मण व गुह रात भर पहरा देते रहे।

रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्। अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥

राम को ही दशरथ समझना, जनकनंदिनी सीता को मुझ (अपनी माँ) जैसा मानना, और वन को ही अयोध्या समझना। बेटा, सुख से जाओ।

— वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकांड — सुमित्रा का लक्ष्मण को उपदेश

आज के जीवन में सीख

सीता, लक्ष्मण और उर्मिला — तीनों ने अपने तरीक़े से त्याग किया। सच्चा प्रेम सिर्फ़ अच्छे दिनों का साथी नहीं होता, वह कठिन रास्ते पर भी साथ चलता है।

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सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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