किष्किंधाकांड · अध्याय 24

बाली वध

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इस अध्याय के पात्र

अब तक की कहानी

श्रीराम और सुग्रीव ने अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता की है। श्रीराम ने सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी वापस दिलाने का वचन दिया है।

श्रीराम के कहने पर सुग्रीव ने किष्किंधा जाकर बाली को ललकारा। दोनों भाइयों में भयंकर युद्ध हुआ। पर दोनों इतने मिलते-जुलते थे कि पेड़ के पीछे खड़े श्रीराम पहचान ही नहीं पाए कि कौन बाली है। वे बाण नहीं चला सके, और सुग्रीव मार खाकर भाग आया।

सुग्रीव ने दुखी होकर शिकायत की। श्रीराम ने समझाया कि गलत बाण चल जाता तो मित्र की ही जान जाती। इस बार उन्होंने सुग्रीव के गले में फूलों की एक बेल की माला डाल दी, ताकि युद्ध में उसे पहचाना जा सके।

सुग्रीव ने फिर ललकारा। बाली की पत्नी बहुत समझदार थी। उसने बाली को रोका — जो अभी हारकर गया, वह इतनी जल्दी लौटा है, तो उसके साथ ज़रूर कोई बड़ा सहारा है। सुना है अयोध्या के राजकुमार राम उसके मित्र बने हैं। पर बाली ने अपने बल के घमंड में किसी की नहीं सुनी।

युद्ध के बीच श्रीराम ने बाण चलाया और बाली धरती पर गिर पड़ा। उसने श्रीराम से पूछा — आपने छिपकर मुझे क्यों मारा? श्रीराम ने उत्तर दिया — तुमने छोटे भाई की पत्नी को छीनकर बड़ा किया। यह धरती भरत के राज्य में है, और अधर्मी को दंड देना राजा का कर्तव्य है। यह संवाद आज भी विद्वानों में चर्चा का विषय है।

अंत समय में बाली का मन बदल गया। उसने श्रीराम को प्रणाम किया और अपने पुत्र अंगद को उनके हाथों में सौंप दिया। सुग्रीव को भी उसने प्रेम से समझाया। सुग्रीव किष्किंधा का राजा बना और अंगद को युवराज बनाया गया।

अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥

श्रीराम बाली से कहते हैं — छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्रवधू और बेटी, ये चारों एक समान आदर के योग्य हैं।

— श्रीरामचरितमानस, किष्किंधाकांड

आज के जीवन में सीख

ताक़त का घमंड अच्छी सलाह सुनने नहीं देता। तारा की बात मान ली होती, तो कहानी कुछ और होती।

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सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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