सुंदरकांड · अध्याय 33
लंका दहन
अब तक की कहानी
मेघनाद के ब्रह्मास्त्र से बँधकर हनुमान जी रावण की सभा में पहुँचे। विभीषण के कहने पर रावण ने उन्हें मारने के बजाय उनकी पूँछ में आग लगाने का आदेश दिया है।
राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ पर कपड़े लपेटे और उन पर तेल डाला। पर जितना कपड़ा लपेटते, पूँछ उतनी ही लंबी होती जाती। नगर का सारा कपड़ा और तेल ख़त्म होने लगा। आख़िर उन्होंने आग लगा दी और ढोल बजाते हुए हनुमान जी को गलियों में घुमाने लगे।
पूरा नगर तमाशा देखने आया। तभी हनुमान जी ने अपना रूप बहुत छोटा कर लिया और बंधनों से निकल गए। फिर वे विशाल हो गए और एक छलाँग में ऊँची अटारियों पर जा पहुँचे। रामचरितमानस कहता है कि उसी समय भगवान की प्रेरणा से उनचास चलने लगे।
हनुमान जी एक महल से दूसरे महल पर कूदते गए, और जलती पूँछ से सोने की लंका में आग फैलती गई। राक्षस चीखते-भागते रहे। पर रामचरितमानस के अनुसार उन्होंने विभीषण का घर नहीं जलाया, क्योंकि वह राम-भक्त का घर था।
आग देखकर अचानक हनुमान जी काँप उठे — कहीं अशोक वाटिका में माता सीता को तो कुछ नहीं हुआ? वे घबराकर दौड़े। वाल्मीकि रामायण बताती है कि सीता जी ने अग्नि देव से प्रार्थना की थी कि हनुमान को कष्ट न हो, इसीलिए आग उन्हें जला नहीं रही थी। सीता जी सुरक्षित थीं।
हनुमान जी ने समुद्र में कूदकर पूँछ की आग बुझाई। लंका के लोगों ने समझ लिया कि जिसका एक दूत ऐसा है, उसका स्वामी कैसा होगा। रावण के की सोने की नगरी पर पहली बड़ी चोट पड़ चुकी थी।
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
उस समय भगवान की प्रेरणा से उनचास पवन चलने लगे। हनुमान जी ज़ोर से हँसकर गरजे और बढ़कर आकाश तक जा पहुँचे।
— श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड
आज के जीवन में सीख
जो आग आपको नुक़सान पहुँचाने के लिए लगाई जाए, उसे भी हिम्मत से अपनी ताक़त बनाया जा सकता है। पर जोश में भी अपनों की चिंता मत भूलिए।
सभी अध्याय
- 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
- 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
- 3विश्वामित्र और ताड़का वध
- 4अहल्या का उद्धार
- 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
- 6परशुराम का क्रोध
- 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
- 8कैकेयी के दो वरदान
- 9राम का वनवास
- 10केवट का प्रेम और गंगा पार
- 11राजा दशरथ का देहांत
- 12भरत का प्रेम और त्याग
- 13भरत मिलाप और राम की पादुका
- 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
- 15दंडक वन से पंचवटी तक
- 16शूर्पणखा
- 17खर-दूषण का वध
- 18मारीच और सोने का हिरण
- 19सीता हरण
- 20जटायु का बलिदान
- 21शबरी के बेर
- 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
- 23सुग्रीव से मित्रता
- 24बाली वध
- 25सीता की खोज और संपाती
- 26समुद्र लाँघने का निश्चय
- 27सुरसा और सिंहिका
- 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
- 29अशोक वाटिका में माता सीता
- 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
- 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
- 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
- 33लंका दहन
- 34चूड़ामणि लेकर वापसी
- 35विभीषण की शरणागति
- 36राम सेतु का निर्माण
- 37अंगद बने शांति-दूत
- 38युद्ध का आरंभ
- 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
- 40कुंभकर्ण
- 41मेघनाद वध
- 42रावण वध
- 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
- 44अयोध्या वापसी
- 45श्रीराम का राज्याभिषेक
- 46राम राज्य
- 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
- 48लव-कुश ने गाई रामायण
- 49सीता जी का धरती में समाना