उत्तरकांड · अध्याय 49

सीता जी का धरती में समाना

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अश्वमेध यज्ञ में लव-कुश ने रामायण गाई, और श्रीराम को पता चल गया है कि वे सीता जी के पुत्र हैं।

श्रीराम ने वाल्मीकि जी के पास संदेश भेजा — अगर सीता जी निर्दोष हैं, तो वे सभा में आकर सबके सामने लें, ताकि प्रजा के मन से हर संदेह मिट जाए। अगले दिन सभा में ऋषि-मुनि, राजा और प्रजा सब एकत्र हुए।

वाल्मीकि जी सीता जी को लेकर आए। सीता जी की आँखें झुकी थीं और हाथ जुड़े थे। वाल्मीकि जी ने घोषणा की — मैंने हज़ारों वर्ष तप किया है। अगर सीता में कोई दोष हो, तो मेरे तप का फल नष्ट हो जाए। सीता पूरी तरह पवित्र हैं, और ये दोनों बालक आपके ही पुत्र हैं।

तब सीता जी ने धीरे से कहा — अगर मैंने मन, वचन और कर्म से श्रीराम के सिवा किसी और का विचार नहीं किया, तो माता मुझे अपनी गोद में स्थान दें। वे धरती की ही बेटी थीं — राजा जनक ने उन्हें खेत की धरती से पाया था।

उसी क्षण धरती फट गई। एक दिव्य सिंहासन प्रकट हुआ, और माता पृथ्वी ने प्रेम से सीता जी को अपनी बाँहों में लेकर सिंहासन पर बिठाया। आकाश से फूल बरसे, और सीता जी धरती में समा गईं। पूरी सभा स्तब्ध रह गई।

श्रीराम शोक में डूब गए। उन्होंने धरती से सीता जी को लौटाने की विनती की, और क्रोध भी किया। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें सांत्वना दी कि सीता जी के साथ उनका मिलन परलोक में होगा। श्रीराम ने लव-कुश को अपनाया और लंबे समय तक धर्म से राज किया। अंत में, परंपरा के अनुसार, वे सरयू नदी में प्रवेश करके अपने दिव्य धाम लौट गए। भक्त सीता जी को धैर्य, सहनशीलता और आत्म-सम्मान की देवी के रूप में पूजते हैं।

आज के जीवन में सीख

सीता जी ने अपने सम्मान को किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं रहने दिया। अपनी सच्चाई पर गर्व करना और गरिमा से खड़े रहना — यही उनकी सबसे बड़ी सीख है।

सभी अध्याय

  1. 1रामायण की शुरुआत — वाल्मीकि और नारद
  2. 2दशरथ का यज्ञ और चारों भाइयों का जन्म
  3. 3विश्वामित्र और ताड़का वध
  4. 4अहल्या का उद्धार
  5. 5सीता स्वयंवर और शिव धनुष
  6. 6परशुराम का क्रोध
  7. 7राज्याभिषेक की तैयारी और मंथरा
  8. 8कैकेयी के दो वरदान
  9. 9राम का वनवास
  10. 10केवट का प्रेम और गंगा पार
  11. 11राजा दशरथ का देहांत
  12. 12भरत का प्रेम और त्याग
  13. 13भरत मिलाप और राम की पादुका
  14. 14अत्रि और अनसूया का आशीर्वाद
  15. 15दंडक वन से पंचवटी तक
  16. 16शूर्पणखा
  17. 17खर-दूषण का वध
  18. 18मारीच और सोने का हिरण
  19. 19सीता हरण
  20. 20जटायु का बलिदान
  21. 21शबरी के बेर
  22. 22श्रीराम और हनुमान का मिलन
  23. 23सुग्रीव से मित्रता
  24. 24बाली वध
  25. 25सीता की खोज और संपाती
  26. 26समुद्र लाँघने का निश्चय
  27. 27सुरसा और सिंहिका
  28. 28हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं
  29. 29अशोक वाटिका में माता सीता
  30. 30हनुमान जी ने दी श्रीराम की मुद्रिका
  31. 31अशोक वाटिका का विध्वंस और अक्षय कुमार
  32. 32ब्रह्मास्त्र और रावण की सभा
  33. 33लंका दहन
  34. 34चूड़ामणि लेकर वापसी
  35. 35विभीषण की शरणागति
  36. 36राम सेतु का निर्माण
  37. 37अंगद बने शांति-दूत
  38. 38युद्ध का आरंभ
  39. 39लक्ष्मण को शक्ति और संजीवनी
  40. 40कुंभकर्ण
  41. 41मेघनाद वध
  42. 42रावण वध
  43. 43सीता जी की वापसी और अग्नि परीक्षा
  44. 44अयोध्या वापसी
  45. 45श्रीराम का राज्याभिषेक
  46. 46राम राज्य
  47. 47वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश का जन्म
  48. 48लव-कुश ने गाई रामायण
  49. 49सीता जी का धरती में समाना

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